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Monday, April 19, 2010

एक मानचित्र में कितने रंग?

कभी आपने सोचा है एक रंगीन नक्शे (मानचित्र) में कितने तरह के रंग प्रयोग किए जाते हैं? वैसे तो चाहे जितनी मर्जी इस्तेमाल किए जा सकते हैं लेकिन 1852 में एक नक्शे को रंगते हुए फ्रांसिस गुथरिए नामक एक वनस्पतिशास्त्री और गणितज्ञ के दिमाग में ये सवाल आया कि कम से कम कितने रंगों के इस्तेमाल से कोई भी नक्शा बनाया जा सकता है ताकि कोई भी दो पड़ोसी देशो को एक ही रंग में ना रंगना पड़े? देशों के आकार-प्रकार और हर देश के लिए पड़ोसी देशों की संख्या जो भी हो उन्होने अटकलबाजी करते हुए एक अनुमान लगाया कि इस सवाल का उत्तर चार रंग है. और चार रंग ही पर्याप्त हैं ऐसे किसी भी नक्शे को बनाने के लिए. इस अनुमान ने चार रंगों वाले कंजेक्चर को जन्म दिया.

गणित में अटकलबाजी का बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है. अनुमान, अनुभव और अंतर्ज्ञान के आधार पर गणितज्ञ कोई बात कह देते हैं. जब तक ये बात सही या गलत सिद्ध नहीं हो जाती तब तक इसे अटकलबाजी ही तो कहेंगे ! तो इन्हें तब तक कंजेक्चर कहा जाता है, सिद्ध हो जाने के बाद ये कंजेक्चर प्रमेय हो जाते हैं.

फ्रांसिस के अनुमान के बाद सौ वर्षों से अधिक तक यह सवाल अनुमान ही बना रहा. चार रंग वाले सवाल (फोर कलर प्रोबलम) के नाम से प्रसिद्ध यह टोपोलोजी के सबसे प्रसिद्ध और ऐतिहासिक सवालों में से एक है. बाकी सवालों की ही तरह इसे भी हल करने के प्रयास होते रहे और कई लोगों ने इसे साबित भी कर दिखाया. इन कई लोगों के प्रमाण कई वर्षों तक मान्य भी रहे. पर कुछ सालों बाद इनमें गलतियाँ ढूँढ ली गयी. ऐसे ही एक प्रमाण को गलत साबित करते हुए 1890 में पार्सि जॉन हेवूड ने एक नया सिद्धांत दिया जिसमें उन्होने यह साबित किया कि पाँच रंगों से ऐसे नक्शे बनाना संभव है. पर वो ये नहीं दिखा सके कि चार रंगों में ही संभव है या नहीं ! तो मूल सवाल अभी भी  बना रहा.

इस सिलसिले में ग्राफ थियरि और टोपोलोजी का खूब विकास हुआ. ग्राफ रंगने से जुड़े अनगिनत सिद्धांत और सवालों का जन्म हुआ. ग्राफ थियरि में इस सवाल को इस तरह देखा जाता है: हर देश को एक बिन्दु से निरूपित किया जाता है और हर पड़ोसी देश को एक रेखा से जोड़ दिया जाता है. फिर सवाल ये हो गया कि कितने रंग चाहिए जिससे एक रेखा से जुड़े कोई भी दो बिन्दु एक ही रंग में ना रंगे हो? वैसे तो लगता है... ठीक है रोचक सवाल है. लेकिन इसका क्या उपयोग है? इस सवाल का बड़ा व्यापक उपयोग है... जैसे टेलीकॉम कंपनियां अपना नेटवर्क डिजाइन करते समय इसका इस्तेमाल कुछ इस तरीके से करती हैं: कम से कम कितने ट्रांसमीटर में काम हो जायेगा और फिर उतने ट्रांसमीटर से नेटवर्क डिजाइन कैसे किया जाय?

हाँ तो ये रंगों का सवाल कंजेक्चर बना रहा और अंततः 1976 में इलियोनोई विश्वविद्यालय के वोल्फगैंग हेकेन और केनेथ एपेल ने घोषणा की ये चार रंगों वाला सवाल अब चार रंगों वाले प्रमेय के नाम से जाना जायेगा. यानि उन्होने इस कंजेक्चर को सिद्ध कर देने की घोषणा की. पर समस्या अभी गयी नहीं और इस हल ने एक नए विवाद को जन्म दिया. कई गणितज्ञों ने इस हल को मानने से इंकार कर दिया. इस हल में गणित के अलावा कंप्यूटर की मदद ली गयी. इस सवाल को हल करते हुए अंत में 1476 ऐसी अवस्थाएँ बची जिन्हें अगर एक-एक करके जाँच लिया जाय तो ये हल पूर्ण हो जाता. लेकिन इस जाँच में इतनी गणनाएँ थी कि इन्हें कागज-कलम और इंसानी दिमाग-समय में करना असंभव था. दोनों गणितज्ञों ने इस हिस्से को कम्प्युटर जनित अलगोरिथ्म्स से जाँच लिया (कम्प्युटर पर भी इन्हें जाँचने में हजारो घंटे लगे). पर कुछ गणितज्ञों की आपत्ति थी कि अगर कुछ गणनाओं में कहीं कोई गलती हुई तो? पर यह लगभग मान लिया गया कि फ्रांसिस का अनुमान सही था और चार रंग ही पर्याप्त हैं.  तब से अब तक कई परिष्कृत प्रमाण दिये गए इस सवाल के. 2005 में माइक्रोसॉफ़्ट के जोर्जेस गोथिएर और इनरिया के बेंजामिन वर्नर ने इस प्रमेय का एक नया प्रमाण दिया पर वह भी कम्प्युटर आधारित ही है. पर इस प्रमाण में एक-एक करके जाँचने वाला चरण नहीं है. यह प्रमाण फंकशनल प्रोग्रामिंग लैंगवेज़ और कैलकुलस ऑफ इंडक्टिव कंस्ट्रक्शन पर आधारित इंटरैक्टिव थियोरम प्रूवर पर आधारित है.

बिना कम्प्युटर की मदद के इस प्रमेय का अभी भी कोई प्रमाण नहीं है. इस प्रमेय के हल के बाद कम्प्युटर वाली पद्धति का और भी कुछ सवालों के हल में इस्तेमाल हुआ है. वैसे ये पद्धति अभी भी विवादास्पद बनी हुई है !

April fool 5 color mapइस सवाल से जुड़ी कई रोचक बातों में से एक यह भी है: 1975 में मार्टिन गार्डनर  ने अप्रैल फूल जोक के रूप में एक 110 देशों का यह काल्पनिक मानचित्र बनाकर यह कहा कि इस मानचित्र के लिए 5 रंगों की आवश्यकता पड़ेगी और इस तरह चार रंगों वाला कंजेक्चर ही गलत है. पर बाद में यह दिखा दिया गया कि इस मानचित्र को भी 4 रंगों से रंगा जा सकता है.

~Abhishek Ojha~

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इस पोस्ट के लिए उन्मुक्तजी का धन्यवाद. उन्होने पिछली पोस्ट पर की गयी टिपण्णी में इस सवाल पर लिखने का सुझाव दिया था.

Tuesday, March 23, 2010

कोनिसबर्ग के पुलों वाली पहेली और टोपोलोजी की शुरुआत

कोनिसबर्ग के पुलों वाली पहेली एक सरल और रोचक ऐतिहासिक पहेली है. ये गणित की उन पहेलियों में से है जिन्हें समझना बिल्कुल ही आसान था, पर हल करना थोड़ा मुश्किल. कहते हैं टोपोलोजी की विचारधारा का जन्म इसी पहेली से हुआ. यह पहला सवाल हैं जहाँ पर टोपोलोजी के निशान देखे जा सकते हैं. यही नहीं गणित (और कम्प्युटर साइन्स) की एक प्रसिद्ध शाखा ग्राफ थियरि का विकास भी इसी पहेली से शुरू हुआ. तब जर्मनी के कोनिसबर्ग शहर जो अब कालीनीनग्राद  के नाम सेजाना जाता है और अब रूस में स्थित है के प्रेगेल नदी से बने द्वीप और नदी पर बने सात पुलों ने एक पहेली को जन्म दिया. हालांकि द्वितीय विश्व युद्ध में इनमें से दो पुल ध्वस्त हो गए और उन पुलों में से अब बस पाँच (इन पाँच में से दो पुल उस समय के हैं, बाकी फिर से बनाये गए हैं) बचे हैं. कोनिसबर्ग के तब की तस्वीर का रेखाचित्र और अब के गूगल अर्थ की तस्वीर से तुलना की जा सकती है.

 image  Konigsberg

कोनिसबर्ग तब व्यापार का केंद्र हुआ करता और ये पुल शहर के अलग-अलग हिस्सों में जाने के लिए इस्तेमाल किए जाते. कोनिसबर्ग के किसी घुमंतू खुराफाती व्यक्ति के दिमाग में ये सवाल आया कि क्या किसी एक जगह से शुरू होने वाली ऐसी यात्रा संभव है जिसमें एक ही यात्रा में इन सातों पुलों को एक और बस एक ही बार पार किया जाय और उस जगह पर वापस आया जाय जहाँ से यात्रा शुरू की गयी थी. ना तो किसी पुल को दुबारा पार करना पड़े और ना ही आधा.

अब पहेली तो बन गयी पर ऐसा रास्ता कोई नहीं ढूँढ पाया. ना ही कोई ये सिद्ध कर पाता कि ऐसा संभव नहीं है. अगर आपको याद हो तो बचपन में हमसे भी कुछ होशियार बच्चे कहते कि बिना कलम उठाये एक विकर्ण सहित वर्ग बनाकर दिखाओ. अब बनाने की कोशिश तो हम सभी करते और अंत में कहते नहीं हो रहा ! कुछ ऐसी ही हालत कुछ वर्षों तक  रही होगी कोनिसबर्ग में भी. फिर किसी ने 1736 में ये पहेली तब के प्रसिद्ध गणितज्ञ ओयलर को लिख भेजा. ओयलर सेंट पिटसबर्ग में रहते थे. और उस समय गणित के अलावा यांत्रिकी, भौतिकी और खगोलीय विषयों पर भी काम करते थे. अब इतने मशहूर व्यक्ति थे तो जाहिर है व्यस्त भी रहते थे. कहते हैं उस दौरान वो औसतन सप्ताह में एक शोध पत्र छापा करते. ओयलर को ये सवाल पहले तो बहुत हल्का और बेकार सा लगा पर फिर उन्होने स्वयं एक पत्र में लिखा 'ये मामूली सा सवाल है पर फिर भी मुझे यह समय व्यतीत करने लायक लगा क्योंकि ज्यामिति, बीज गणित और अंक गणित से इसे हल कर पाना संभव नहीं लगता. ' ओयलर ने इस सवाल को व्यापक बनाकर हल किया और यह दिखाया कि किन हालतों में (कितने पुल हो तो) ऐसी यात्रा संभव है. उन्होने यह भी दिखाया कि 7 पुल वाले  मामले में ऐसी यात्रा संभव नहीं.
गौर करने की बात ये है कि इस पहेली में कौन सा पुल किस से कितनी दूरी पर है और किस पुल की लम्बाई कितनी है यह मायने नहीं रखता. संभवतः गणित का यह पहला ऐसा सवाल था जिसमें ज्यामिति जैसी स्थिति होते हुए भी नापने या अंकों की बात ही नहीं थी ! साथ ही यह भी मायने नहीं रखता था कि एक पुल से दूसरे पुल तक जाने का रास्ता सीधा था या टेढ़ा-मेढ़ा. ओयलर ने इसे ग्राफ थियरि से हल किया, इसे हल करने के सिलसिले ने ही ग्राफ थियरि को जन्म दिया और फिर आगे चल कर इन अवधारणाओं पर ही टोपोलोजी का जन्म हुआ. बाद के मशहूर ट्रावेलिंग सेल्समैन जैसे सवाल भी एक तरह से इसी श्रेणी में आते हैं. टोपोलोजी में एक जैसे सवालों/वस्तुओं/समुच्चयों का एक समूह होता है. जैसे यहाँ एक जगह से दूसरी जगह जाने के रास्ते के बीच की दूरी और सीधा-टेढ़ा होना माने नहीं रखता वैसे ही वहाँ एक गोले और घन में फर्क नहीं होता क्योंकि एक को पीटकर दूसरा बनाया जा सकता है. टोपोलोजी के इस सिद्धांत की चर्चा अगले पोस्ट में. 
गूगल ने इस प्रसिद्ध पहेली से जुड़ी प्रेगेल नदी के नाम पर ही अपने एक ग्राफ कम्प्यूटिंग का नाम प्रेगेल रखा है.
और ये रही ओयलर के आरिजिनल पेपर से एक तस्वीर:  image



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पोस्टोपरांत अपडेट: (अभय तिवारी जी की टिपण्णी के बाद)
ओयलर का हल:
ओयलर ने इस पहेली को ग्राफ में परिवर्तित किया और जैसा कि मैंने ऊपर कहा इस ग्राफ में रेखाओं का सीधा-टेढ़ा होना और बिन्दुओं के बीच की दुरी मायने नहीं रखती. इस ग्राफ में बिंदु जमीन और सात रेखाएं सात पुलों को दर्शाती हैं. ओयलर ने कहा कि पहेली के हिसाब से अगर एक रास्ता ढूँढना है तो यात्रा करते समय बीच में आने वाले सारे बिन्दुओं पर एक आने का और एक जाने का रास्ता होना चाहिए. इस हिसाब से सारे बिन्दुओं पर रेखाओं की संख्या सम होनी चाहिए. केवल २ बिन्दुओं पर जहाँ से यात्रा शुरू हो और जहाँ ख़त्म हो केवल वहीँ विषम संख्या में रेखाएं हो सकती है. और अगर यात्रा जहाँ से शुरू करनी है वहीँ ख़त्म भी तो फिर सारे ही बिंदुओं पर रेखाओं की संख्या सम होनी चाहिए. पर इस ग्राफ में सभी बिन्दुओं पर विषम संख्या में रेखाएं हैं (३ और ५). इसलिए पहेली के हिसाब से यात्रा संभव नहीं है !
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~Abhishek Ojha~

Thursday, January 28, 2010

ये क्या उपयोग हुआ?

टोपोलोजी शुद्ध गणित का एक विशुद्ध टाइप का ब्रांच होता है. एकदम अमूर्त... वो गणित जो बस इसलिये पढ़ा-पढ़ाया और विकसित किया जाता है क्योंकि बस गणित है. सालों तक कोई उपयोग या वास्तविक जीवन से जोड़कर नहीं देखा गया. ऐसे में अगर कोई पूछ ले: टोपोलोजी का उपयोग क्या है? तो ये सवाल बड़ा कठिन हो जाता है. अगर आपसे कोई पूछे कि अंकगणित का क्या उपयोग है, त्रिकोणमिति का क्या उपयोग है या फिर ज्यामिति का क्या उपयोग है तो झट से कुछ चित्र  दिमाग में आते हैं. कुछ कोण, क्षेत्रफल, खगोल, गति, दूरी, ऊँचाई... इत्यादि. लेकिन टोपोलोजी का प्रत्यक्ष उपयोग देखने को नहीं मिलता और सीधा-सीधा उपयोग बता पाना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि ऐसा उपयोग है ही नहीं. वैसे धीरे-धीरे टोपोलोजी के सिद्धांतों के कई उपयोग होने लगे हैं. इस ज्यामितीय सोच से कई बातों को समझने में सुविधा हुई है.

अगर कोई उत्सुक व्यक्ति गणित की अन्य शाखाओं के उपयोग के बारे में जानना चाहे तो उसे कोई वस्तु या कोई चित्र बनाकर संतुष्ट किया जा सकता है. अगर किसी टोपोलोजिस्ट से पूछा जाय तो वो भी शायद एक कैंची और कागज की सहायता से मोबियस स्ट्रिप (पट्टी) बना कर दिखा सकता है. उस पट्टी को Mobius stripRecycling Symbol काटकर और क्या बनाया जा सकता है ये भी दिखा सकता है. हाँ ये बात अलग है कि किसी भी सामान्य व्यक्ति का अगला सवाल ये होगा कि इस स्ट्रिप का अब मैं क्या करूँ? मोबियस स्ट्रिप एक ही सतह की ऐसी पट्टी होती है जिसपर अगर आप एक बिन्दु से चलना चालू करें तो उस पट्टी के हर भाग से घूमकर वापस उसी बिन्दु पर वापस आ सकते हैं बिना कभी किनारे को पार किए ! इस लिंक पर आप चींटियों का मोबियस स्ट्रिप पर चलना देख सकते हैं.  इस स्ट्रिप की तर्ज पर ही एक क्लाइन बोतल भी होती है. घूम-फिर के वापस वहीं पर आ जाने वाली बात के चलते रिसाइक्लिंग का संकेत मोबियस स्ट्रिप पर आधारित होता है.

एक टोपोलोजिस्ट आपको एक धागे कि मदद से ये भी दिखा सकता है कि कैसे तीन छल्लों को आपस में इस तरह जोड़ा जा सकता है जबकि कोई भी दो आपस में ना जुड़े हो ! (बोरोमीयन रिंगस). अगर वो कुछ और उपयोग दिखाना चाहे तो कुछ पार्लर ट्रिक भी दिखा सकता है. जैसे बिना कोट उतारे अंदर के अँगरखे को उतरना borromean rings संभव है या नहीं ! अगर पक्का टोपोलोजिस्ट हुआ तो ट्रिक तो दिखाने से रहा... कागज पर इस ट्रिक के पीछे का गणित घंटों तक जरूर लिख सकता है.

पर ये उपयोग टोपोलोजी के उपयोग का कार्टून बनाने की तरह है. इसके असली उपयोग गणितीय ही होते हैं. इन उपयोगों से मुझे अपने एक गणित के प्रोफेसर साहब याद आते हैं. वो कहते कि मैं घर बैठे अपने दोस्त के साथ या अकेले भी बैंडमिंटन खेल लेता हूँ ! हाथ में कागज और पेंसिल लेकर. मुझे इसके लिए न तो कोर्ट जाने की जरूरत पड़ती है ना भाग-दौड़ ही. लेकिन अगर कागज पर बैडमिंटन के समीकरण लिखे जायें तो इसे बैडमिंटन खेलना तो नहीं कह सकते न? ठीक इसी तरह ऊपर जो उपयोग मैंने बताये वो किसी तरह टोपोलोजी के कुछ वास्तविक उपयोग ढूँढने के प्रयास भर हैं.

पार्लर ट्रिक वाला उदाहरण थोड़ा बेहतर है. कुछ भी संभव है या नहीं? इस सवाल/प्रक्रिया को गणितीय/ज्यामितीय रूप में लिखकर फिर हाँ या ना में उत्तर निकालना... टोपोलोजी का एक अच्छा उपयोग है.

टोपोलोजी की बाकी कड़ियाँ:

टोपोलोजी और फक्का !
बंद भी खुला भी !

~Abhishek Ojha~

Tuesday, November 24, 2009

बंद भी खुला भी !

टोपोलोजी की बात शुरू होने के पहले बंद हो गयी. बात प्रस्तावना से आगे बढ़ी ही नहीं. 'शुरू होने से पहले ही बंद...? !' अब बात थी टोपोलोजी की तो ऐसा ही होना था. इससे याद आया एक उदहारण जो उस किताब में है जिसने हमारा और टोपोलोजी का पहला परिचय कराया. जेम्स मुन्क्रेस की किताब 'टोपोलोजी'.Topology Munkres टेक्स्टबुक के रूप में शायद दुनिया के सभी बड़े स्कूलों में उपयोग की जाती है. उदहारण कुछ ऐसा है... एक समुच्चय (सेट) और दरवाजे में फर्क ये है कि दरवाजा एक समय पर या तो खुला रह सकता है या बंद... पर एक समुच्चय खुला (ओपन सेट) भी हो सकता है बंद (क्लोज सेट) भी, और खुला और बंद दोनों हो सकता है ! पहली बार पढ़ा था तो मजा तो आया था. साथ में ये भी लगा था ससुर समुच्चय ना हुआ अजूबा हो गया. वैसे टोपोलोजी अजूबा ही है [बस समझ में आना चाहिए, मुझे बहुत ज्यादा नहीं आता :) एक ईमानदार स्टेटमेंट दे रहा हूँ. अब इंसान एक समय पर ईमानदार और बेईमान दोनों तो नहीं हो सकता !]

टोपोलोजी गणित कि नयी शाखाओं में से है. करीब ९० साल पहले इसे गणित की एक स्वतंत्र शाखा के रूप में पहचान मिली तो इससे जुड़े लगभग सारे महत्तवपूर्ण सिद्धांत पिछले ५० सालों में दिए गए. पर शुरुआत तो कोनिग्स्बर्ग के पुलों वाले सवाल से ही मानी जाती है जिसका  हल अठारहवी सदी में हुआ. इस सवाल की चर्चा अगली पोस्ट में. टोपोलोजी को गणित की कई पुरानी मान्यताओं में क्रातिकारी परिवर्तन लाने के लिए जाना जाता है. और और गणित को सिर्फ 'अंको की भाषा' वाली परिभाषा से बाहर लाकर खड़ा करने में में तो सबसे ज्यादा योगदान टोपोलोजी का ही है. शुरुआत में यह गणित की कुछ शाखाओं से सम्बंधित था और अक्सर इसे ज्यामिति की शाखा समझ लिया जाता था. पर अब स्वतंत्र रूप से टोपोलोजी ने गणित की सभी शाखाओं के अलावा विज्ञान की कई शाखाओं को प्रभावित किया है. मोटे तौर पर टोपोलोजी एक ज्यामितीय 'सोच' है. जिसमें कई वस्तुओँ के सामूहिक ज्यामितीय गुणों का अध्ययन किया जाता है. यह गणित की एक क्वांटीटेटिव  ना होकर क्वालिटेटिव (किसी भी वस्तु के गुण के बारे में अध्ययन से सम्बंधित) शाखा है. इसे इस तरह समझा जा सकता है... इसमें किसी सवाल को हल करने की जगह उसके गुणों का अध्ययन किया जाता है. हल करने की जगह ये देखा जाता है कि हल संभव भी है या नहीं. गणित की कई शाखाओं को एक सूत्र में जोड़ने का श्रेय टोपोलोजी को जाता है. एक ऐसी विचारधारा का विकास जिस पर गणित के कई सिद्धांत आधारित हैं. एक प्रयास जो गणित के अब तक विकसित सिद्धांतों को एक सोच के अन्दर समेट सके.

टोपोलोजी शुद्ध गणित की एक प्रतिष्ठित शाखा है. जिसमें स्वयंसिद्ध परिभाषित किये जाते हैं फिर उनका इस्तेमाल कर प्रमेय, फिर उन्हें साबित किया जाता है. 'किसी भी वस्तु से सम्बंधित सवालों के बारे में एक गुण को लेकर उसे सही या गलत साबित करना' इसी अवधारणा पर टोपोलोजी का विकास हुआ. पहले ऐसे कई सवाल हुआ करते थे जिन्हें हल करने के लिए लोग सदियों तक लगे रहे, बिना ये सोचे कि हल संभव भी है या नहीं ! टोपोलोजी की मदद से ऐसे कई Tropic of Cancerसवाल सहज हुए. कई सवालों के लिए यह साबित किया गया कि इनका हल संभव ही नहीं है तो कई अन्य के लिए ये कि ऐसे कई सवालों का हल एक ही है और इनमें से किसी एक को भी हल किया गया तो सारे हल  हो जायेंगे. टोपोलोजी में मात्रा या परिमाण(क्वांटिटी) मायने नहीं रखते पर उनके गुण मायने रखते हैं.  जैसे पुणे और दिल्ली के बीच में कहीं से कर्क रेखा गुजरती है या नहीं ऐसे सवालों के जवाब टोपोलोजी के दायरे में आयेंगे. कहाँ से गुजरती है ये टोपोलोजी के लिए मायने नहीं रखता.
काश जिंदगी और मानवीय सोच भी गणित की तरह होते और उन्हें एक सूत्र में पिरोया जा सकता ! टोपोलोजी जैसे गणित ज्यादा पढने वाले शायद यही सब सोच कर फिलोस्फर (पागल?) हो जाते हैं.

बस आज के लिए इतना ही अब ये श्रृंखला चालु कर दी है तो ख़त्म भी करूँगा ही. कब और कितने दिनों के अन्तराल पर पोस्ट करूँगा ये मायने नहीं रखता :)

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~Abhishek Ojha~

Tuesday, June 30, 2009

टोपोलोजी और फक्का !

पहले परिचय फक्का से. वाक्य प्रयोग के हिसाब से फक्का या तो खाने की चीज होती है या लगने वाली. पर वास्तव में कम से कम खाने की तो नहीं होती ! हमारे कॉलेज में ग्रेडिंग होती है और 'ए' से 'एफ' तक (‘इ’ छोड़कर) ग्रेड मिलते हैं. कॉलेज शब्दावली में इन्हें क्रमशः इक्का, बिक्का, सिक्का, डिक्का और फक्का कहा जाता है. अब तो आप समझ ही गए होंगे फक्का मतलब न्यूनतम ग्रेड अर्थात फेल ! तो ये शब्द खूब इस्तेमाल होता था. वैसे फक्का शब्द का मूल शब्द 'एफ' ग्रेड है या ‘चार अक्षरीय एफ शब्द’ कई चर्चाओं के बाद भी ये अब तक अनजान ही है. विद्वानों में इस पर मतभेद है और जब तक कोई भाषाविज्ञानी इस पर काम नहीं करता हम ये मानते हैं कि फिलहाल दोनों ही संभव है. :)

अब बात टोपोलोजी की. टोपोलोजी गणित की एक मुख्य शाखा है. वैसे नाम सुनकर तो यही लगता है कि कुछ ऐसा गणित होता होगा जिसमें टोपने की कला सिखाई जाती होगी ! टोपने के फोर्मुले ! (अब टोपना क्या होता है ये नहीं पता तो किसी भी कनपुरिये से पूछ लीजिये. मुझे पूरा यकीन है कि से शब्द कैम्पस के बाहर से आया होगा). पर जब पता चला कि टोपोलोजी निर्विवाद रूप से सबसे ज्यादा फक्के लगाने (खिलाने) वाला कोर्स होता है तो लगा कि टोपोलोजी शायद इसलिए कहते होंगे क्योंकि इसमें टोप के भी कोई पास नहीं हो पाता. अक्सर परीक्षा के पहले ये बात उठती… ‘टोपोगे तो किसका?’ एक आध जिनको समझ में आता वो टोपा-टापी से दूर ही रहने वाले विजातीय लोग हुआ करते थे. और हर बार दो तिहाई क्लास फक्का खा जाती. तो गणित नहीं हॉरर हुआ करता था. और भय फर्स्ट इयर से ही चालु हो जाता. अब मध्यकालीन भारत में नादिरशाह आया होगा... तब फ़ोन तो नहीं था फिर भी २-४ गाँव तक आतंक की खबर तो पहुचती ही होगी. वैसे ही भरपूर आतंक हुआ करता टोपोलोजी का भी.

कुल मिला के टोपोलोजी का आतंक और फक्को से बड़ा गहरा नाता रहा है. वैसे अजीब विषय है जिनके नंबर आते हैं उनके पूरे आते हैं और बाकी खाता ही नहीं खोल पाते खोलते भी हैं तो ५-१० से आगे नहीं बढ़ पाते. बीच के नंबर लाने वाले बिरले ही होते हैं. पूरी तरह से से अब्सट्रैक्ट गणित होता है जिनको समझ में आये तो एकदम ही. ना आये तो फिर... !

वैसे एक बार इलाहबाद में स्थित एचआरआई में एक कांफ्रेंस में एक हमउम्र विद्यार्थी से मुलाकात हुई तो उसने बताया 'इस साल तो टोपोलोजी जैसे कुछ स्कोरिंग पेपर थे तो अच्छे नंबर आ गए !' हम तो उसे बड़ी इज्जत कि नजरों से देखे. क्या तेज लड़का है ! फिर उसने बताया '२०-२५ सवाल रट लेने होते हैं और हर साल वही तो आता है पेपर में !'. इससे हमारी उच्च शिक्षा के स्तर का पता चलता है, कितनी मददगार है न !. खैर हमें तो बहुत दुःख हुआ... काश ! हम भी वैसे पास हुए होते. कहाँ हमारे क्लास के रणबांकुरे चौथी बार में पास हुए थे. खैर आपको बता देता हूँ भले किसी लड़की से उसकी उम्र १० बार पूछियेगा किसी आईआईटी कानपुर/दिल्ली में पढ़े इंसान से टोपोलोजी का ग्रेड और कितनी बार में पास हुआ ये मत पूछियेगा. मैं बस इतना बताये दे रहा हूँ कि एक बार में ही पास हो गया था अब ग्रेड तो नहिये बताऊंगा चाहे कुछ भी हो जाए :)

हाँ तो अब मन किया... थोडा आपको बता दिया जाय कि ये चीज क्या होती है ! गणित की इस शाखा और इससे जुड़े कुछ गणितज्ञों के बारे में अगली कुछ कड़ियों में. वैसे एक बात है अगर कोई अच्छा पढाने वाला हो और टोपोलोजी को फील करने वाला इंसान तो फिर ये आनंद की प्राप्ति करने वाला होता है. वैसे मुझे कभी फीलिंग नहीं आ पायी पर कुछ बातें बड़ी रोचक लगी और इससे जुड़े कुछ लोग तो... !

घबराइये नहीं रोचक कहानिया, किस्से और इतिहास ही होगा और आप सब को इक्का तो मिलेगा ही.

~Abhishek Ojha~