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Tuesday, March 23, 2010

कोनिसबर्ग के पुलों वाली पहेली और टोपोलोजी की शुरुआत

कोनिसबर्ग के पुलों वाली पहेली एक सरल और रोचक ऐतिहासिक पहेली है. ये गणित की उन पहेलियों में से है जिन्हें समझना बिल्कुल ही आसान था, पर हल करना थोड़ा मुश्किल. कहते हैं टोपोलोजी की विचारधारा का जन्म इसी पहेली से हुआ. यह पहला सवाल हैं जहाँ पर टोपोलोजी के निशान देखे जा सकते हैं. यही नहीं गणित (और कम्प्युटर साइन्स) की एक प्रसिद्ध शाखा ग्राफ थियरि का विकास भी इसी पहेली से शुरू हुआ. तब जर्मनी के कोनिसबर्ग शहर जो अब कालीनीनग्राद  के नाम सेजाना जाता है और अब रूस में स्थित है के प्रेगेल नदी से बने द्वीप और नदी पर बने सात पुलों ने एक पहेली को जन्म दिया. हालांकि द्वितीय विश्व युद्ध में इनमें से दो पुल ध्वस्त हो गए और उन पुलों में से अब बस पाँच (इन पाँच में से दो पुल उस समय के हैं, बाकी फिर से बनाये गए हैं) बचे हैं. कोनिसबर्ग के तब की तस्वीर का रेखाचित्र और अब के गूगल अर्थ की तस्वीर से तुलना की जा सकती है.

 image  Konigsberg

कोनिसबर्ग तब व्यापार का केंद्र हुआ करता और ये पुल शहर के अलग-अलग हिस्सों में जाने के लिए इस्तेमाल किए जाते. कोनिसबर्ग के किसी घुमंतू खुराफाती व्यक्ति के दिमाग में ये सवाल आया कि क्या किसी एक जगह से शुरू होने वाली ऐसी यात्रा संभव है जिसमें एक ही यात्रा में इन सातों पुलों को एक और बस एक ही बार पार किया जाय और उस जगह पर वापस आया जाय जहाँ से यात्रा शुरू की गयी थी. ना तो किसी पुल को दुबारा पार करना पड़े और ना ही आधा.

अब पहेली तो बन गयी पर ऐसा रास्ता कोई नहीं ढूँढ पाया. ना ही कोई ये सिद्ध कर पाता कि ऐसा संभव नहीं है. अगर आपको याद हो तो बचपन में हमसे भी कुछ होशियार बच्चे कहते कि बिना कलम उठाये एक विकर्ण सहित वर्ग बनाकर दिखाओ. अब बनाने की कोशिश तो हम सभी करते और अंत में कहते नहीं हो रहा ! कुछ ऐसी ही हालत कुछ वर्षों तक  रही होगी कोनिसबर्ग में भी. फिर किसी ने 1736 में ये पहेली तब के प्रसिद्ध गणितज्ञ ओयलर को लिख भेजा. ओयलर सेंट पिटसबर्ग में रहते थे. और उस समय गणित के अलावा यांत्रिकी, भौतिकी और खगोलीय विषयों पर भी काम करते थे. अब इतने मशहूर व्यक्ति थे तो जाहिर है व्यस्त भी रहते थे. कहते हैं उस दौरान वो औसतन सप्ताह में एक शोध पत्र छापा करते. ओयलर को ये सवाल पहले तो बहुत हल्का और बेकार सा लगा पर फिर उन्होने स्वयं एक पत्र में लिखा 'ये मामूली सा सवाल है पर फिर भी मुझे यह समय व्यतीत करने लायक लगा क्योंकि ज्यामिति, बीज गणित और अंक गणित से इसे हल कर पाना संभव नहीं लगता. ' ओयलर ने इस सवाल को व्यापक बनाकर हल किया और यह दिखाया कि किन हालतों में (कितने पुल हो तो) ऐसी यात्रा संभव है. उन्होने यह भी दिखाया कि 7 पुल वाले  मामले में ऐसी यात्रा संभव नहीं.
गौर करने की बात ये है कि इस पहेली में कौन सा पुल किस से कितनी दूरी पर है और किस पुल की लम्बाई कितनी है यह मायने नहीं रखता. संभवतः गणित का यह पहला ऐसा सवाल था जिसमें ज्यामिति जैसी स्थिति होते हुए भी नापने या अंकों की बात ही नहीं थी ! साथ ही यह भी मायने नहीं रखता था कि एक पुल से दूसरे पुल तक जाने का रास्ता सीधा था या टेढ़ा-मेढ़ा. ओयलर ने इसे ग्राफ थियरि से हल किया, इसे हल करने के सिलसिले ने ही ग्राफ थियरि को जन्म दिया और फिर आगे चल कर इन अवधारणाओं पर ही टोपोलोजी का जन्म हुआ. बाद के मशहूर ट्रावेलिंग सेल्समैन जैसे सवाल भी एक तरह से इसी श्रेणी में आते हैं. टोपोलोजी में एक जैसे सवालों/वस्तुओं/समुच्चयों का एक समूह होता है. जैसे यहाँ एक जगह से दूसरी जगह जाने के रास्ते के बीच की दूरी और सीधा-टेढ़ा होना माने नहीं रखता वैसे ही वहाँ एक गोले और घन में फर्क नहीं होता क्योंकि एक को पीटकर दूसरा बनाया जा सकता है. टोपोलोजी के इस सिद्धांत की चर्चा अगले पोस्ट में. 
गूगल ने इस प्रसिद्ध पहेली से जुड़ी प्रेगेल नदी के नाम पर ही अपने एक ग्राफ कम्प्यूटिंग का नाम प्रेगेल रखा है.
और ये रही ओयलर के आरिजिनल पेपर से एक तस्वीर:  image



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पोस्टोपरांत अपडेट: (अभय तिवारी जी की टिपण्णी के बाद)
ओयलर का हल:
ओयलर ने इस पहेली को ग्राफ में परिवर्तित किया और जैसा कि मैंने ऊपर कहा इस ग्राफ में रेखाओं का सीधा-टेढ़ा होना और बिन्दुओं के बीच की दुरी मायने नहीं रखती. इस ग्राफ में बिंदु जमीन और सात रेखाएं सात पुलों को दर्शाती हैं. ओयलर ने कहा कि पहेली के हिसाब से अगर एक रास्ता ढूँढना है तो यात्रा करते समय बीच में आने वाले सारे बिन्दुओं पर एक आने का और एक जाने का रास्ता होना चाहिए. इस हिसाब से सारे बिन्दुओं पर रेखाओं की संख्या सम होनी चाहिए. केवल २ बिन्दुओं पर जहाँ से यात्रा शुरू हो और जहाँ ख़त्म हो केवल वहीँ विषम संख्या में रेखाएं हो सकती है. और अगर यात्रा जहाँ से शुरू करनी है वहीँ ख़त्म भी तो फिर सारे ही बिंदुओं पर रेखाओं की संख्या सम होनी चाहिए. पर इस ग्राफ में सभी बिन्दुओं पर विषम संख्या में रेखाएं हैं (३ और ५). इसलिए पहेली के हिसाब से यात्रा संभव नहीं है !
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~Abhishek Ojha~

Friday, October 24, 2008

इश्क से गिरे, गणित पे अटके ...

फर्मैट के अन्तिम प्रमेय की श्रृंखला में कई बातें आई थी... अब इतने लंबे समय तक अगर कोई सवाल अनसुलझा रहे तो कहानियाँ तो होगी ही। कई सारे पुरस्कार भी रखे गए थे...

एक ऐसा ही पुरस्कार रखा था जर्मनी के डॉक्टर उद्योगपति पॉल फ्रेडरिक वोल्फ्केल (Paul Friedrich Wolfskehl) ने। यूँ तो पेशे से डॉक्टर थे पर एक बीमारी की वजह से ये पेशा छोड़ना पड़ा। और फिर गणित में रूचि हो गई... पर इन्होने अपनी कमाई के एक बड़े हिस्से को फर्मैट के अन्तिम प्रमेय पर पुरस्कार देने की जो घोषणा की उसके पीछे गणित में उपजी रूचि से ज्यादा इश्क का हाथ था।

कहते हैं की वोल्फ्केल को इश्क में धोखा मिला (जो की अक्सर मिलता है...) और फिर वो ऐसे टूटे की उन्होंने आत्महत्या की सोंची (अक्सर हो न हो ये भी होता ही है)।

पर इसी बीच वो पुस्तकालय चले गए और गणित की एक किताब में खो गए... उन्हें फर्मैट के अन्तिम प्रमेय पर लिखे गए क्युम्मर (Kummer) के एक पेपर में ऐसा लगा कि कुछ गड़बड़ है। दरअसल इस पेपर में क्युम्मर ने कौशी (Cauchy) के काम में गलती निकाली थी, जिससे यह साबित हुआ था कि कौशी का प्रूफ़ ग़लत है. वोल्फ्केल को लगा कि क्युम्मर ही ग़लत है और कौशी अभी भी सही है... हालाँकि उनको जो लगा वो बात तो नहीं थी पर इसमें वो ऐसे उलझे कि आत्महत्या का विचार ही त्याग दिया। और चूँकि ये सारे पेपर फर्मैट के अन्तिम प्रमेय से सम्बंधित थे तो उन्हें लगा की कहीं न कहीं उनकी जान बचाने में इस प्रमेय का भी हाथ हैं।

अब उनकी प्रेमिका कौन थी ये तो कोई नहीं जानता पर ये कहानी उस प्रेमिका का नाम लिए बिना कई किताबों में छपी... और कारण भले थोड़े अलग हो पर कहानी ऐसी ही होती है... कुछ लोग ऐसा कारण भी देते हैं: उन्हें अपनी प्रेमिका की बेवफाई के बाद फिर से दुबारा प्यार नहीं हो पाया और वो नहीं चाहते थे की उनके बाद ये पैसा उनकी बीवी को मिले ! और पुराना प्यार भुलाने में प्रमेय ने मदद तो की ही थी... तो अगर पैसे कहीं लगाना ही है तो इसी काम में क्यों नहीं ! और इस तरह उन्होंने अपनी कमाई के १ लाख मार्क (आज के १० लाख पौंड) उस आदमी को देने की घोषणा कर दी जो पहली बार इस प्रमेय को सही या ग़लत साबित करेगा।

उनकी मृत्यु के करीब ९० साल बाद अंततः ये पुरस्कार एंड्र्यू वाइल्स को १९९७ में दिया गया। इतिहास में एक बार दिए गए इस पुरस्कार के बारे में और जानकारी के लिए यहाँ जाकर पढ़ें.

फर्मैट की श्रृंखला के अन्य लेख:
१. गणित के महानतम सवाल का रोचक इतिहास (बातें गणित की... भाग VII)
२. एक अनसुलझे सवाल से मिली मदद (बातें गणित की... भाग VIII)
३. सात साल में बना १००० पन्नों का हल (बातें गणित की... भाग IX)
४. एंड्र्यू वाइल्स, फील्ड्स मेडल और एक महिला गणितज्ञ (बातें गणित की... भाग X)
५. एक महिला गणितज्ञ के गणित प्रेम की दुखद कहानी ! (बातें गणित की... भाग XI)

गणित द्बारा जान बचाने वाली एक और कहानी:
गणित ने बचाई जान (बातें गणित की भाग... IV)

~Abhishek Ojha~

Tuesday, July 29, 2008

एंड्र्यू वाइल्स, फील्ड्स मेडल और एक महिला गणितज्ञ (बातें गणित की... भाग X)

पिछले पोस्ट में हमने देखा की किस तरह एंड्र्यू वाइल्स ने सात सालों की कठिन मेहनत के बाद एक बड़ा सा हल निकाला. ये उस सवाल का हल था जिसे हल करने की कोशिश अब तक के सबसे महान गणितज्ञ कर चुके थे. एंड्र्यू वाइल्स ने कितनी मेहनत की थी इसका अंदाजा तो आप पिछले पोस्ट पर उनकी तस्वीर देखकर ही लगा सकते हैं. एंड्र्यू वाइल्स ने गणित का महानतम सवाल हल किया और एक सवाल के हल ने उन्हें महान गणितज्ञों की श्रेणी में ला खड़ा किया. पर गॉस, ओय्लर जैसे गणितज्ञ क्या इनसे कमजोर थे? ऐसे सवाल तो उठने ही नहीं चाहिए पर लोग उठाते हैं. और मेरे जैसे जो गॉस की विद्वता के घोर प्रसंशक हैं वो यही कहते हैं कि न तो गॉस ने सात साल तक इस सवाल पर काम किया और ना ही तब गणित इतना विकसित था. हाँ ये बात और है की अगर गॉस ने ७ सालों तक इस सवाल पर काम कर दिया होता तो आज नंबर थियोरी की कई शाखाएं होती. गॉस की विद्वता तो आगे कई पोस्ट में आएगी ही. पर एंड्र्यू वाइल्स की विद्वता भी अतुलनीय है और ऐसे विवाद सही में कोई मायने नहीं रखते. एंड्र्यू वाइल्स अपने गणित के अनुभव के बारे में कहते हैं:

अगर मुझे गणित पर अपने अनुभव के वर्णन करने को कहा जाय तो शायद मैं कहूं की यह एक अंधेरे कमरे में प्रवेश करने की तरह है, पहला कमरा... अंधकारमय, बिल्कुल अंधकारमय. इधर-उधर भटकना, उछलना और फिर धीरे-धीरे पता चलने लगता है की कहाँ कौन सा फर्नीचर है. और फिर अंततः ६ महीने या ऐसे ही कुछ समय पश्चात पता चलता है की स्विच किधर है, उसे दबा देना और फिर सबकुछ जगमगा उठता है... तब सब कुछ दिखने लगता है और ये पता चलता है कि मैं कहाँ हूँ ! -- एंड्र्यू वाइल्स बीबीसी की एक डॉक्युमेंट्री के प्रारम्भ में.

हर चार साल पर दिया जाने वाला फील्ड्स मेडल गणित के क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है. तो फिर एंड्र्यू वाइल्स को निर्विवाद रूप से मिल जाना चाहिए. पर फील्ड्स मेडल में एक शर्त होती है की पुरस्कार मिलने वाले साल तक गणितज्ञ की आयु ४० से ज्यादा नहीं होनी चाहिए ! एंड्र्यू वाइल्स का जन्म १९५३ में हुआ था और उस हिसाब से १९९४ में वो एक साल ज्यादा के हो गए थे. नियम तो फिर नियम ही है तो उन्हें ये पुरस्कार नहीं दिया गया*. पर फील्ड्स मेडल की समिति ने उन्हें पुरस्कृत करना ही उचित समझा और १९९८ में उन्हें अलग से एक विशेष रजत-फलक दिया गया. फील्ड्स मेडल पर महान गणितज्ञ आर्कीमिडिस की तस्वीर होती है. ४० साल से कम क्यों? इसकी एक आम धारणा ये है की गणितज्ञ अपनी मौलिक सोच (Original ideas) ४० के पहले ही सोचते हैं इसके बाद वो गणित पर बस काम करते हैं खोज तो कम उम्र में ही होती है. इस चालीस साल की बात से याद आया जी एच हार्डी की ये बात जो उन्होंने अपनी पुस्तक 'A Mathematician's Apology' में लिखी है.**
"किसी भी गणितज्ञ को ये नहीं भूलना चाहिए की गणित युवा लोगों का खेल है. इसका सबसे आसान उदहारण यही है की रोयल सोसाइटी में गणितज्ञों की औसत उम्र सबसे कम है. और भी कई उदहारण लिए जा सकते हैं न्यूटन ने ५० की उम्र में गणित छोड़ दिया. वे मानते थे की ४० वर्ष की उम्र के साथ ही उनकी मौलिक रचनात्मकता के महानतम दिन ख़त्म हो गए...
...गैल्वास की मृत्यु २१ साल की उम्र में हो गई. रामानुजन ३३ में और रीमान ४० की उम्र में चल बसे. कुछ लोगों ने इस उम्र के बाद भी काम किया है जैसे की गॉस ने डिफेरेंसिअल जियोमेट्री तब लिखी जब वो ५० साल के थे, लेकिन इसका विचार उन्हें १० साल पहले ही आ गया था. मेरी नज़र में कोई बड़ी गणितीय खोज ४० की उम्र के बाद किसी ने नहीं की. और अगर किसी की इस उम्र के बाद गणित गणित में रूचि कम हो जाती है तो इससे न तो उसकी न गणित की ही कोई क्षति होने वाली है." --जी एच हार्डी


कई गणितज्ञों ने फ़र्मैट के अन्तिम प्रमेय पर काम किया ये तो हम देख ही चुके है पर अगर इस महिला गणितज्ञ की चर्चा न हो तो शायद श्रृंखला अधूरी रह जाय. पोस्ट लम्बी हो रही है इसलिए आगे नहीं लिखूंगा बस इतना बताता चलूँ की इस महान गणितज्ञ को महिला होने का खामियाजा भुगतना पड़ा. नहीं तो आज इतिहास में कहीं और ज्यादा नाम होता... फ़र्मैट के अन्तिम प्रमेय पर सही तरीके से सोचने वाले बहुत कम लोगों में वो एक थी. उस संघर्ष, दुःख और गणित से प्यार की कहानी अगले पोस्ट में.



चित्र: साभार, विकिपीडिया
*ऐसे पुरस्कारों के साथ ऐसी कहानियाँ तो होती ही है... शायद नोबेल पुरस्कार की सबसे बड़ी कमी हमेशा के लिए ये रह जाय की गांधीजी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला. गांधीजी ऐसे किसी पुरस्कार के मोहताज तो न थे... पर ये मलाल शायद नोबेल समिति को रहे. इस बारे में अगर रूचि हो तो नोबेल पुरस्कार की आधिकारिक वेबसाइट पर इस लिंक पर पढ़ आए.
**पुस्तक की सॉफ्ट कॉपी पास में होने का यह एक बहुत बड़ा फायदा है... जब जिस पैराग्राफ की जरुरत हो खोल के सर्च कर लो.

Tuesday, July 1, 2008

गणित ने बचाई जान (बातें गणित की भाग... IV)

आज बात ऐसी... जिसमें गणित ने एक व्यक्ति की जान बचाई। वो भी किसी साधारण नहीं, ऐसे व्यक्ति की जिसे आगे चलकर नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया. जी हाँ आप को गणित से डर लगता है वो तो ठीक है पर आज ये प्रसंग सुन लीजिये, इसके बाद शायद आप गणित की महत्ता तो मानेंगे ही.

बात है रुसी क्रांति के समय की... सोवियत रूस के गणितीय भौतिकी (Mathematical Physics) के विद्वान इगोर टैम (Igor Tamm) को दक्षिणी उक्रेन के ओडेसा के समीप एक गाँव में साम्यवाद विरोधी (Anti-Communist) गिरोह ने धर दबोचा. उन्हें उक्रेन विरोधी साम्यवादी समझकर वो उन्हें अपने सरगना के पास ले गए...

सरदार ने पूछा: 'जीविका चलाने के लिए क्या करते हो?'
'जी, गणितज्ञ हूँ... !' [ बेचारे ठहरे गणित पढने-पढाने वाले... धर्मेन्द्र तो थे नहीं कि सरदार का खून ही पी जाते :)]
'हम्म...' [अगर गब्बर होता तो: साम्भा की तरफ़ देखकर सोचता... साम्भा की जगह इसी को रख लेते हैं हमारा काम करेगा, साम्भा आजकल बहुत घपला करता है आदमी और गोली गिनने में :-)]

पर कमाल की बात ये थी की ये सरदार पढ़ा-लिखा था और वो भी गणित जानता था.
सरदार बोला: 'ठीक है... किसी फलन (function) के टेलर श्रेणी (Taylor Series) के n स्थानों तक अनुमान लगाने में जो त्रुटी होगी, वो बता दो तो तुम्हे छोड़ दिया जायेगा नहीं तो तुम्हे गोली मार दी जायेगी'.

टैम साहब ने कांपती उंगुलियों से जमीन की धुल में त्रुटी निकाली, सरदार ने उत्तर देखा और कहा की इसे जाने दो.
[मोगैम्बो खुश हुआ !, और सरदार का वादा था तो मुकर जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता]

सन १९५८ में टैम साहब को नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया... उन्हें जीवन भर उस दस्यु-सरगना का पता तो नहीं चल पाया... पर छात्रो को गणित की उपयोगिता बताने के लिए ये कहानी जरूर अमर हो गई.

चित्र साभार: नोबेल पुरस्कार वेबसाईट


ये कहानी मेरे मित्र और ऑफिस में सहकर्मी अजित बुरड ने मेरी गणित वाली श्रृंखला पढने के बाद भेजी, मैंने अनुवाद करके पोस्ट ठेल दिया. इसके अलावा गणित की शुद्धता वाली पोस्ट पर ये चुटकुला भी उन्होंने भेजा है और अपने ब्लॉग पर भी डाला है. आप भी देखिये.


अजित कम्प्यूटर साइंटिस्ट हैं, और ज्यादातर टेक्नीकल चीज़ों पर लिखते हैं उनकी वेबसाइट और अंग्रेजी में ब्लॉग आप यहाँ देख सकते हैं गणित में भी अच्छी रूचि रखते हैं. हाँ एक और बात अगर आप कोटा या जयपुर से हैं तो आज से ठीक ५ साल पहले यानी २००३ में आपने उनकी तस्वीर अखबार में देखी होंगी... कारण IIT की संयुक्त प्रवेश परीक्षा २००३ में टॉप १० में से एक थे, आशा है इस जानकारी के लिए वो नाराज नहीं होंगे ... बिना उनकी इजाजत के ही लिख रहा हूँ, अगर उनको आपत्ति होगी तो हटा दी जायेगी तब तक आपने पढ़ लिया तो ठीक :-)



इस बीच दिनेशराय द्विवेदीजी की एक हौसला बढाती हुई e-चिट्ठी मिली, बहुत आभार उनका. मसिजीवीजी ने भी ये पोस्ट ठेल डाली उनका भी आभार. इस सप्ताह अनुप्रयुक्त गणित के कुछ उदहारण लिखने वाला था अपने किए कुछ अलग-अलग कामों में से... वो अगले पोस्ट में. समयाभाव के इस सप्ताह के लिए बस इतना ही.

अगर गलती से टेलर श्रेणी में त्रुटी अनुमान जानने की इच्छा हो तो यहाँ देख लें. :-)

~Abhishek Ojha~