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Friday, August 22, 2014

संस्कृत छंदों और संगीत के गणित से फील्ड्स मेडल तक



संस्कृत के छंदो, तबला और अंको से खेलने वाले विलक्षण गणितज्ञ मंजुल भार्गव को इस वर्ष गणित के सर्वोच्च पुरस्कार फील्ड्स मेडल से सम्मानित किया गया. फील्ड्स मेडल कमिटी ने कहा - "अद्भुत रूप से रचनात्मक गणितज्ञ मंजुल भार्गव के कार्य ने संख्या सिद्धान्त पर गहरा प्रभाव छोडा हैं।  गणित के कालातीत खूबसूरत सवालों में गहरी रुचि रखने वाले भार्गव ने ऐसे सवालो को हल करते हुए गहरी समझ प्रदान करने वाले सहज और सशक्त तरीकों की खोज की है."


पहले बात अंक सिद्धांत (नंबर थियरी) और कालातीत खूबसूरत सवालों की - गणित में अंक-सिद्धांत पूर्ण अंको का अध्ययन है जैसे  १,२, ३, -२०, ५०००, ०, ५० इत्यादि. पूर्णांकों के गुण, उनका वर्गीकरण (सम, विषम, रूढ़ संख्यायें इत्यादि. ) तथा उनके आपसी रिश्तों का अध्ययन. उस ज्यामिति का अध्ययन जिसके कोने पूर्णांकों से बने हो. पूर्ण अंको में क्रम-रूप-पैटर्न ढुंढना. ऐसे समीकरणो का अध्ययन जिनके हल पूर्ण अंक होते हैं. इत्यादि। पूर्णांकों का अध्ययन करते हुए कई नए सवाल और जवाब निकलते जाने से बनने वाला गणित.  गणित का वो रूप जो मानव ने सबसे पहले सीखा और हम आज भी बचपन में सबसे पहले गिनती सीखते हैं. आज ये अपने आपमें गणित की एक पूर्ण शाखा है - इतनी महत्त्वपूर्ण की इसे गणित की रानी भी कहते हैं. कालातीत खूबसूरत सवाल यूँ होते है कि जो किसी कम पढ़े लिखे व्यक्ति को भी आसानी से समझाए जा सकते हैं. पर उन्हें हल करना महारथी गणितज्ञों के बस का भी नहीं होता ! उनको हल करते हुए खूबसूरत गणित की परतें खुलती जाती हैं. जैसे गणित का सबसे प्रसिद्ध और एक लम्बे समय तक कठिनतम समझा जाने वाला सेलेब्रिटी सवाल - फ़र्मैट का आखिरी प्रमेय.


मंजुल भार्गव पिंगल-हेमचन्द्र-ब्रह्मगुप्त-नारायण पंडित-फ़र्मैट-गॉस-रामानुजन-एंड्रू वाइल्स घराने के गणितज्ञ हैं ! वैसे ये घराना मैंने अभी-अभी बनाया है. दरअसल ये वो महान गणितज्ञ हैं जिनकी विरासत को मंजुल भार्गव ने आगे बढ़ाया है. उनके काम और उनकी असाधारण उपलब्धियां उनको इन महान गणितज्ञों की श्रेणी में ला खड़ा करते हैं. गणित के अलावा भी मंजुल भार्गव का व्यक्तित्व बहुत रोचक  है. कनाडा में जन्म, अमेरिका में पले-बढे, जयपुर में अपने दादाजी के सानिद्ध्य में संस्कृत-संगीत और प्राचीन भारतीय गणित का अध्ययन, माँ से अनौपचारिक रुप से औपचारिक गणित की शिक्षा।  नियमित पढाई छोड़ कर बीच बीच में या तो वो अपनी माँ की गणित की कक्षा (जो गणित की एक प्रोफ़ेसर हैं) में जाकर बैठते या भारत में अपने दादाजी के साथ (संस्कृत के प्रोफ़ेसर) संस्कृत और संगीत (तबला) सीख रहे होते. बाद में उन्होंने विख्यात ज़ाकिर हुसैन से भी संगीत की शिक्षा ली.


प्राचीन भारत में गणित की समृद्ध परम्परा रही है. मंजुल भार्गव ने गणित उसी परंपरा से सीखन शुरू किया. संस्कृत के छंदों में भी गणित का इस्तेमाल होता है. पिंगल ने सर्वप्रथम छंदशास्त्र में (लगभग ४०० ई पू, कई इतिहासकारो के अनुसार पिंगल प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य महर्षि पाणिनि के भाई थे) गुरु (s) और लघु (।) वर्णो का जिक्र किया। उन्होंने किसी भी छंद को द्विघाती (बाइनरी) में लिखने के साथ वर्णो की संख्या और क्रम का भी वर्णन किया. संभवतः ‘कॉम्बिनेटोरिक्स’ और ‘बाइनरी’ का विश्व में कहीं भी पहला लिखित रूप यही है. लघु को एक तथा गुरु को दो वर्ण माने तो एक निश्चित वर्ण समूह से कितने छंद संभव है? इस सवाल के हल ने ही विख्यात फिबोनाची क्रम को जन्म दिया ! पिंगल के मेरु प्रस्तर (आज का पास्कल ट्रेंगल) और  मात्रा-मेरु में फिबोनाची के प्रारंभिक विचार थे. फिबोनाची क्रम का वर्णन विरहांक (६००-८०० ई), गोपाल (११३५ ई के पहले) तथा हेमचन्द्र (११५० के पहले) ने किया। जैन विद्वान हेमचन्द्र, जिन्हे कलिकाल सर्वज्ञ भी कहते हैं, ने गोपाल की व्याख्या को समृद्ध कर आज के फिबोनाची क्रम का स्पष्ट वर्णन किया। कालांतर में नारायण पंडित (१३५६ ई) ने गणित कौमुदी में सामासिक-पंक्ति का जिक्र किया। फिबोनाची क्रम सामासिक पंक्ति का एक विशेष रूप भर है. फिबोनाची ने इस क्रम का जिक्र १२०२ ई में किया. फिबोनाची क्रम को कई गणितज्ञ गोपाल-हेमचन्द्र नम्बर्स के नाम से जानते हैं. मंजुल भार्गव के मुंह से फिबोनाची क्रम की जगह हेमचन्द्र नम्बर्स सुनना सुखद लगा. फिबोनाची क्रम और सौंदर्य अनुपात संभवतः प्रकृति में पाये जाने वाले गणित की खूबसूरती के सबसे बड़े उदाहरण हैं. गणित से मंजुल भार्गव का पहला परिचय इन संस्कृत छन्दो और शास्त्रीय संगीत (तबला) के धुनों से ही हुआ.


हावर्ड में स्नातक की पढाई करते हुए भार्गव ने गॉस की किताब Disquisitiones Arithmeticae पढ़ा, महानतम गणितज्ञ गॉस ने ये किताब 21 साल के उम्र में लिख डाला था। ये पुस्तक संख्या सिद्धान्त के गीता की तरह है। जैसे हर कोई कह देता है “गीता में लिखा है” वैसे ही हर अंक शास्त्री के लिए ये किताब है… पर गीता की ही तरह बहुत कम ने इसे अक्षरशः पढ़ा होता है। इस किताब में गॉस ने अनगिनत सिद्धांतों के अलावा अंको के एक ख़ास रूप 'बाइनरि क्वाड्रेटिक फॉर्म्स' की चर्चा की थी। वो अंक जो एक खास नियम का पालन करते हैं।  फिर उन्होने इन ख़ास अंको को मिलाकर इसी परिवार के  नए अंक बनाने का एक संयोजन नियम भी दिया।  ये संयोजन नियम एक तरह से बीजगणितीय संख्या सिद्धान्त के मुख्य उपकरण की तरह हैं। पर गॉस ने 20 पन्नों में इसे बड़ी कठिन गणितीय भाषा में समझाया था। मंजुल भार्गव ने इन अंको और नियमों को समझने का एक बिलकुल नया क्रांतिकारी तरीका दिया। अंको को रुबिक क्यूब के कोनो से सम्बंधित कर उन्होंने एक नया तरीका ईजाद किया। साथ ही अपने इस नए तरीके से उन्होने कई नए संयोजन नियम भी बनाए और द्विघाती (क्वाड्रेटिक) की जगह कई उच्चतर पदीय अंको के लिए नियम भी दिए. उन्होंने कुल 13 नए संयोजन नियमो की खोज की। गॉस के १८०१ में लिखे संयोजन नियम के बाद दो सौ वर्षों तक इससे पहले किसी ने नहीं सोचा था कि उच्चतर पदीय रूप वाले अंको के लिए ऐसे नियम हो भी सकते हैं! अंक सिद्धांत के लिए मंजुल भार्गव के इस नए तरीके और शोध ने जैसे एक नए क्षेत्र को ही जन्म दे दिया.


मंजुल भार्गव ने हाइपर एलिप्टिक कर्व पर भी काम किया है। आसान भाषा में समझना चाहें तो ये ज्यामितीय अध्ययन है इस बात का कि.... किसी गणितीय संगणना से एक वर्ग संख्या आएगी या नहीं !  ऐसे कर्व्स के एक खास वर्ग को एलिप्टिक कर्व्स कहते हैं जिनका इस्तेमाल अब तक के सबसे प्रसिद्ध गणितीय सवाल फ़र्मैट के लास्ट थिओरम को हल करने में भी हुआ था। ये भी एक सुखद संयोग है कि उस ऐतिहासिक सवाल को हल करने वाले प्रिंस्टन विश्विद्यालय के ही एंड्रू वाइल्स के दिशा निर्देशन में मंजुल भार्गव ने पीएचडी की. संसार के सर्वश्रेष्ठ अंक सिद्धांत के विशेषज्ञ संभवतः अभी प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में ही हैं. एक प्रसिद्द और अत्यंत कठिन सवाल है कि एलिप्टिक कर्व्स कितने वास्तविक (रेशनल) अंको से होकर गुजरते हैं. एक, दो, तीन,.... अनंत या एक भी नहीं ! मंजुल भार्गव ने फिर एक बार कर्व्स और उनके वास्तविक बिन्दुओं में सम्बन्ध के नए तरीको से ये समझना आसान किया कि ऐसे कर्व पर कितने रेशनल पॉइंट होंगे।


एक और प्रसिद्ध सवाल जो महान गणितज्ञ फ़र्मैट के जमाने से ही चला आ रहा था वो ये कि क्या कोई ऐसा द्विघाती रूप  हो सकता है जिस रूप में सारी संख्याएँ लिखी जा सके? जैसे क^२ + ख^२ अर्थात दो संखाओं के वर्ग के योग का रूप ऐसा रूप नहीं है जिसमें सारे अंक लिखे जा सके। लैंगरेंज ने पहली बार बताया कि हर अंक को चार संख्याओं के वर्ग के योग के रूप में लिखा जा सकता है (क^२+ख^२+ग^२+घ^२). इसके लगभग सौ वर्षों बाद रामानुजन ने चार अंको के इस्तेमाल से ऐसे ५४ रूप दे दिये जिनमें सारी संख्याओं को लिखा जा सकता है. फिर ये सवाल आया कि ऐसे कितने रूप (फॉर्म्स) हो सकते हैं? १९९० के दशक में सवाल बदल कर ये हो गया कि क्या ऐसा कोई अंक है जिससे छोटी हर संख्या को अगर एक दिए गए रूप में लिखा जा सका तो फिर उस रूप में हर संख्या को ही लिखा जाना संभव है. फिर कुछ गणितज्ञों के प्रयास से ये अनुमान (कंजेक्चर) लगा कि शायद ये संख्या २९० है. मंजुल भार्गव ने अंततः ये साबित किया कि .... २९० और उससे छोटी २८ ऐसी संख्याएँ है कि अगर किसी द्विघाती रूप में इन २९ अंको को लिखा जा सकता है तो वो अंको का वैश्विक रूप हुआ अर्थात उस रूप में हर संख्या लिखी जा सकती है।


संक्षेप में कहना हो तो - मंजुल भार्गव ने बीजगणितीय अंक सिद्धांत की दुनिया के उन चीजों को गिनने के तरीके दिए हैं जो इससे पहले अगम्य थे ! और इन तरीकों ने गणितज्ञों के लिए नयी दुनिया के दरवाजे खोले जहाँ अब कई गणितज्ञ भ्रमण कर नित नयी चीजें ढूंढ पा रहे हैं.


भार्गव एक शुद्ध गणितज्ञ हैं. इस घराने के गणितज्ञ गणित सिर्फ उसकी  खूबसूरती और अपनी समझ, अपने सुकून के लिए पढ़ते हैं उन्हें गणित का कहीं इस्तेमाल नहीं करना होता। बल्कि जब उनके गणित का कहीं इस्तेमाल होने लगता है तो उन्हें आश्चर्य ही होता है. पर अक्सर ऐसा गणित उपयोग और विज्ञान की तरफ अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है. जैसे रूढ़ संख्याओं का भला क्या उपयोग हो सकता है ?  एक साधारण उदाहरण लेते हैं.... किसी अंक का गुणनखण्ड हम सबने निकाला होगा। दो संख्याओं का गुणनफल निकालना हो तो वो बहुत आसान  होता है पर गुणनखण्ड निकलना उससे थोड़ा कठिन. ठीक यही कम्प्यूटर के लिए भी होता है. कितनी भी बड़ी रूढ़ संख्याएं हो उनका गुणनफल कम्यूटर कुछ पलों में आसानी से निकाल सकता है. पर अगर इसी सवाल का उल्टा करने को कहा जाय और अगर बहुत बड़ी संख्या हो तो कम्प्यूटर भी अरबों खरबों साल लगा दे ! गणितज्ञों को ऐसे सवालों का हल ढूंढने में आनंद आता है. पर खूबसूरती ये है कि सिर्फ आनंद और खूबसूरती के लिए हल किये जाने वाले ऐसे सवालों का इस्तेमाल हर जगह होने लगता है.… जैसे ऐसे सवालों का इस्तेमाल क्रेडिट कार्ड से किये जाने वाले भुगतान में होता है. सुचना सुरक्षित करने में (एन्क्रिप्शन)… आपके क्रेडिट कार्ड की सूचना से भुगतान बहुत आसान पर भुगतान की सुचना से क्रेडिट कार्ड की जानकारी निकलना लगभग असंभव !


मंजुल भार्गव रामानुजन की तरह उन विलक्षण गणितज्ञो की श्रेणी में आते हैं जिनके पास अद्भुत अंतर्दृष्टि (इंट्यूशन) होती है. जो गणित को एक उच्चतर स्तर पर लेकर जाते हैं. जिनके लिए गणित सत्य और खूबसूरती की खोज है. गणित के कठिनतम सवालों को देखने का जिनके पास एक जादुई नजरिया होता है. उनके लिए गणित के किसी कठिन अबूझ से सवाल को हल करने का अर्थ होता है सवाल को बिलकुल ही एक नए नजरिये से देखना। इस नजर से देखा भी जा सकता है पहले किसी ने सोचा भी नही होता. पर सुनने के बाद लगे यही तो असली तरीका है सोचने का - विशिष्ट पर सरल ! मंजुल भार्गव की सोच इतने अद्वितीय रूप से विशिष्ट होती है कि कोई भी गणितज्ञ पढ़ते हुए बता दे कि ऐसा मंजुल भार्गव ही सोच सकते हैं ! जैसे एक कलाकार की कला पहचान होती है, एक कवि की कविता और एक संगीतज्ञ का संगीत।


मंजुल भार्गव गणित को विज्ञान से अधिक कला मानते हैं. उनके अनुसार वो गणित में उन्हीं कारणों से  खोये रहते हैं जिन कारणों से संगीत और कविता में. उनके लिए अंक जैसे एक पंक्ति में खड़े हो जाते दीखते हों, अंतरिक्ष में, वायुमंडल में, रुबिक क्यूब के कोनों पर, संस्कृत अक्षरों में (वो संस्कृत के व्यंजनों  को उच्चारण के आधार पर बना 5x5 का मैट्रिक्स देखते हैं), कविताओं में, तबले की धुन में, कला में... फिर उनसे निकले विचार आलोकित करने वाले होते है ! उनके लिए गणित मानवता और ब्रह्माण्ड के सत्य को अभिव्यक्त करने का तरीका है. वो प्रिंसटन विश्वविद्यालय में संगीत का गणित, संस्कृत छंदों का गणित और जादुई कलाकारियों के गणित का एक कोर्स पढ़ाते हैं जिसमें वो तबला भी बजाते हैं. अगर इस तरीके से गणित पढ़ाया जाने लगे तो भला किसे गणित में आनंद नहीं आएगा। वो कहते हैं - “जब मैं संस्कृत की कविताएँ पढ़ रहा था तब मुझे नहीं पता था कि मैं उनमें मुख्य धारा का गणित भी पढ़ रहा हूँ। बाद में गणित पढ़ते हुए उन्हें फिर से एक नए नाम और नए तरीके से पढ़ना मुझे आह्लादित करता। ऐसी चीजों में मुझे आनंद आता है जब विभिन्न विषयों की अनपेक्षित एकात्मकता देखने को मिलती है!”.


मंजुल भार्गव एक अद्भुत, समृद्ध और विलक्षण परंपरा के वाहक हैं... कामना है आने वाले समय में मंजुल भार्गव ऐसे ही गणित के अद्भुत सिद्धांत देते रहे !

~Abhishek Ojha~
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इस ब्लॉग पर कई पोस्ट हैं जो इस पोस्ट की बातों से जुडी हुई हैं  - पुरानी पोस्टें ज्यादा जुडी हुई है :)
गणित की खूबसूरती - http://baatein.aojha.in/search/label/Beauty%20in%20Mathematics
सौंदर्य अनुपात: http://baatein.aojha.in/search/label/Golden%20Ratio
फ़र्मैट का आखिरी प्रमेय: http://baatein.aojha.in/search/label/Fermat%27s%20Last%20Theorem

Sunday, June 12, 2011

एक ख़ूबसूरत समीकरण

बचपन में गणित की कक्षाओं में पढ़ाया जाता है वर्ग और वर्गमूल. वर्ग अर्थात किसी संख्या को उसी संख्या से गुणा कर दिया जाय तो वर्ग निकल आता है. फिर पढ़ाया जाता है घात अर्थात किसी संख्या के ऊपर जितने का घात हो संख्या को खुद के साथ उतनी बार गुणा. फिर वर्गमूल, घनमूल इत्यादि. साथ में ये बताया जाता है कि वर्गमूल केवल धनात्मक संख्याओं का ही होता है. इन्हीं दिनों ज्यामिति में परिचय होता है वृत्त के परिधि, त्रिज्या से होते हुए ‘पाई’ नामक संख्या से भी. पाई किसी भी वृत्त के परिधि और व्यास के अनुपात से प्राप्त संख्या को कहते हैं. फिर थोडा और आगे बढ़ने पर लघुगणक (लॉगरिदम) पढ़ते हुए परिचय होता है एक और संख्या ‘इ’ से. (वैसे शायद इस संख्या से पहला परिचय कैलकुलस पढते हुए होता है). पाई और ई गणित ही नहीं विज्ञान और अभियांत्रिकी की हर शाखा में खूब इस्तेमाल किये जाने वाले अंक हैं. गणितीय शब्दावली में दोनों अपरिमेय और ट्रान्सेंडैंटल हैं. दशमलव के रूप में लिखा जाय तो दोनों अनंत तक जाते हैं…

फिर गणित पढते हुए एक दिन एक काल्पनिक संख्या आई से परिचय होता है. और इस संख्या से एक अलग अध्याय चालु होता है मिश्रित संख्याओं का. इन्हीं दिनों ये पता चलता है कि बचपन में पढ़ी गयी बात ‘वर्गमूल केवल धनात्मक संख्याओं का ही होता है’ उन्ही लोगों के लिए पढाई जाती हैं जिन्हें गणित बस जोड़-घटाव तक ही पढ़ना होता है. और -१ के वर्गमूल जिसे ‘आई’ भी कहते हैं के साथ एक नयी काल्पनिक दुनिया का आरम्भ होता है. ये काल्पनिकता भी खूब इस्तेमाल होती है. पाई, इ और आई संभवतः विज्ञान और अभियांत्रिकी के सबसे अधिक लिखे जाने वाले गणितीय अंक चिह्न अंक हैं.

इन तीनों अंको के साथ अगर जोड़-घटाव,गुणा-भाग आता हो तो इस समीकरण मेंeuler's equation इसके अलावा कुछ और नहीं है. लेकिन इस समीकरण का मतलब क्या है? महान गणितज्ञ ओय्लर का दिया गया ये समीकरण गणित का सबसे खूबसूरत समीकरण कहा जाता है. (समीकरण चित्र में)

विकिपीडिया क एक पैराग्राफ कुछ यूँ कहता है इस समीकरण के बारे में:


मैथेमेटिकल इंटेलीजेंसर पत्रिका के पाठकों के बीच कराये गए मत के अनुसार ओय्लर का तादात्मय ‘गणित का सबसे खूबसूरत प्रमेय’ है. इसी तरह फिजिक्स वर्ल्ड पत्रिका के पाठकों ने भी २००४ में इसे मैक्सवेल के विद्युत चुम्बकत्व के समीकरण के साथ ‘सर्वकालिक महानतम समीकरण’ चुना. २००६ में न्यू हम्प्शायर विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफ़ेसर पॉल नहीन ने इस समीकरण  पर ४०० पन्नों की ‘डॉ. ओय्लर'स फैबुलस फोर्मुला’ नामक किताब लिखी. इस पुस्तक में उन्होंने इसे ‘गणितीय सुंदरता का सुनहरा मानक’ होने की संज्ञा दी. कोंसटेंस रीड ने इसे ‘सम्पूर्ण गणित का सबसे प्रसिद्द सूत्र’ कहा. कहते हैं एक बार गणितज्ञ गॉस ने टिपण्णी की कि अगर ये सूत्र किसी गणित के छात्र को बताते ही अगर स्पष्ट रूप से समझ में ना आये तो वो छात्र कभी उत्कृष्ट गणितज्ञ नहीं बन सकता. उन्नीसवीं सदी के विख्यात दार्शिनिक, गणितज्ञ और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर बेंजामिन पियर्स ने एक व्याख्यान में इसे साबित करने के बाद कहा: ‘ये पूर्णतया विरोधाभासी है, हम इसे समझ नहीं सकते, हमें नहीं पता कि इसका अर्थ क्या है लेकिन चूँकि हमने इसे सिद्ध किया है तो हम जानते हैं कि ये सच है.’ स्टैंफर्ड विश्वविद्यालय के गणितज्ञ प्रो कीथ डेवलिन ने कहा ‘जैसे शेक्सपियर की एक लंबी कविता प्रेम के असली तत्व को कैद करती है, जैसे एक चित्रकार गहरी मानवीय सुंदरता को उकेरता है वैसे ही ओय्लर का समीकरण अस्तित्व  की गहराई तक पंहुचता है’. [ये पूरा पैराग्राफ विकिपीडिया के एक पैराग्राफ का अनुवाद है. बुरे अनुवाद के लिये हमारी तरफ से ‘सॉरी’ रहेगा.]

एक अंक जो दशमलव में लिखने पर अनंत तक जाता है वो वृत्त के परिधि और व्यास से आया. साथ में एक वैसी ही अजीबो गरीब संख्या ‘इ’. ‘आई’ जो कि काल्पनिक है. और ओय्लर ने कहा कि ‘इ’ पर अगर ‘आई’ और ‘पाई’ के गुणनफल का घात लगा दें तो वो -१ हो जाएगा ! इतने अजीबो गरीब मिलन का इतना साधारण परिणाम ‘१’.

सबसे पहले तो हमने यही पढ़ा होता है कि किसी भी धनात्मक संख्या पर अगर किसी धनात्मक या ऋणात्मक संख्या का घात लगाएं तो परिणाम ऋणात्मक नहीं होता. अगर साधारण तरीके से सोचें तो एक काल्पनिक संख्या और ‘पाई’ के गुणनफल का कुछ अर्थ हो सकता है क्या? फिर ‘इ’ और उसके ऊपर ये विकट काल्पनिक घात. अगर बचपन की पढ़ी बात से समझें तो ‘इ’ को ‘इ’ से ही गुणा करना है, लेकिन कितनी बार? ‘एक काल्पनिक संख्या से गुणा किये हुए अनंत तक जाने वाली संख्या के गुणनफल के बराबर?’ ! विचित्र ! और इस विकटता का हल अत्यंत ही साधारण याने -१. (अगर e(x) का विस्तार और त्रिकोणमिति के sin(x) और cos(x) के विस्तार पता हों तो इसका प्रमाण भी ऐसा ही साधारण होता है.)

विकटता के मिश्रण से उपजी सरलता इस समीकरण को खूबसूरत बना देती है. मुझे अपने एक पुराने मॉडर्न आर्ट पर लिखे गए पोस्ट की याद आ रही है. अगर आपने यहाँ तक पढ़ा है तो इस समीकरण पर बने कुछ कार्टून भी देखते जाएँ. मैं क्या कहूँ. अपने काजल कुमार जी बेहतर व्याख्या कर पायेंगे कार्टूनी सुंदरता.


389-beautye_to_the_pi_times_i
आई और पाई पर पर एक ये भी:

numbers


~Abhishek Ojha~

Wednesday, February 23, 2011

अंको का विभाजन


अंको की अपनी दुनिया है. इनमें डूबने वाले खूब गोते लगाते हैं. ऐसे ही गोते लगाने वालों में एक थे 'को नहीं जानत है जग में'  की तर्ज पर प्रसिद्द गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन. इन्ट्यूशनिज्म के महारथी... ऐसे गणितज्ञ जो पता नहीं कैसे सोच कर ऐसी बातें लिखते जिन्हें समझना उस समय तो क्या अब भी मुश्किल है. ऐसे लोगों के बारे में कुछ भी कहना मुश्किल होता है क्योंकि एक तो अपने छोटे जीवन में वे बहुत कुछ कह नहीं पाए फिर जो कुछ कहा भी उसमें से दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से बहुत कुछ खो गया… फिर जो कुछ मिला उसमें से कुछ बातें अपूर्ण ही मिल पायी... और फिर कुछ ऐसी भी मिली जिनका मतलब समझ पाना आसान नहीं. खैर इनके बारे में कभी पूरी श्रृंखला लिखने का मन है. फिलहाल उनके पहले पत्र से लेकर उनकी म्रत्यु के ५७ वर्षों के बाद ट्रिनिटी कॉलेज कैम्ब्रिज की लाइब्रेरी में मिले इनके कुछ नोट्स पर हुए शोध के बारे में. (जो बाद में दो अमेरिकी गणितज्ञों ने रामानुजन'स लोस्ट नोटबुक्स के नाम से प्रकाशित की, जिनमें से एक गणितज्ञ ने कहा था "The discovery of this Lost Notebook caused roughly as much stir in the mathematical world as the discovery of Beethoven’s tenth symphony would cause in the musical world." ).  इस सवाल के शोधकर्ता को इस साल का फील्ड्स मेडल मिलना लगभग तय सा है.

ये गणित के उन सवालों में से है जिन्हें समझने के लिए बस जोड़ और गिनती आना पर्याप्त है पर हल होने में सदियाँ गुजर गयी. अब देखिये न कितना आसान है: ३ = १+१+१ = २+१ = ३. वैसे ही ४ = ३+१ = २+२ = २+१+१ = १+१+१+१ = ४. साधारण सा जोड़... और अंको के विभाजित करने का तरीका. जैसे ३ को १ और २ से जोड़ कर बनाया जा सकता है या १,१ और १ से और ३ एक खुद. इस तरह ३ को विभाजित करने के ३ तरीके हुए वैसे ही ४ को विभाजित करने के पांच तरीके होंगे. अब सवाल ये है कि किसी अंक को कुल कितने तरीके से विभाजित किया जा सकता है? बहुत ही साधारण सा सवाल है.

लेकिन ३ और ४ के लिए तो ठीक पर ये अंक जैसे जैसे बढते हैं इनके विभाजन के तरीके बड़े अजब-गजब तरीके से तेजी से बढ़ते हैं. जैसे अगर १०० को विभाजित करना हो तो कुल १९०५६९२९२ तरीके हो जाते हैं. अब १००० को करना हो तो कितना बड़ा अंक आ जाएगा ये आप इस लिंक पर देख आयें. थोडा और बढ़ा दें तो पता चले कि ये कम्पूटर भी ना निकाल पाए ! अब सवाल ये था कि कैसे निकाला जाय कि किसी अंक को कुल कितने तरीके से विभाजित किया जा सकता है?

पहली कोशिश महान गणितज्ञ ओय्लर साहब ने की थी. ओय्लर साहब ने  जेनेरेटिंग फंक्शन और पावर सीरीज की मदद से सवाल को नए तरीके से लिखा. साधारण भाषा में कहने का मतलब ये कि वो कुछ ऐसा कह गए कि अगर दिल्ली से कलकत्ता की दुरी पता करना हो तो उसकी जगह अगर ये पता कर लें कि किस चाल से वहाँ  पहुचने में कितना समय लगता है तो भी दूरी निकाली जा सकती है. पर दिल्ली से कलकत्ता जाए कैसे? ये किसी को अभी भी पता नहीं था. कहने का मतलब ये कि सवाल अभी भी हल नहीं हो पाया !

१९१३ तक इस सवाल की किसी को हवा तक नहीं लग पायी. फिर १९१३ में मद्रास के एक बालक ने इंग्लैण्ड के हार्डी को जो पत्र लिखा उसमें एक फोर्मुला था. जो गलत होते हुए भी इस सवाल का अब तक का सबसे महत्तवपूर्ण सुझाव साबित हुआ. और फिर बाद में रामानुजन ने एक फोर्मुला दिया और हार्डी ने मिलकर साबित किया. मेजर मैकमोहन ने किया जोड़ घटाव का काम (मेजर साब के बारे में फिर कभी). यह कालजयी सूत्र गणित में एक चमत्कार सा था. यह सही सही तो नहीं पर बहुत सटीक अनुमान देता था सवाल के उत्तर का कितने भी बड़े अंक के लिए.

उनेक बाद सवाल लगभग वहीँ का वहीँ पड़ा रहा. १९३७ में उनके नोट्स का इस्तेमाल कर हान्स रादेमचेर ने एक सूत्र बनाया पर वो भी अनंत अंको को जोडने वाला कठिन सूत्र था. फिर एमरी विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर केन ओनो और उनके सहयोगियों ने पिछले महीने इस सवाल को हल कर लेने की घोषणा की. प्रोफ़ेसर ओनो कहते हैं कि ओय्लर ने जो दिया उससे  गणित के ब्रह्माण्ड में बस मंगल ग्रह तक को देख पाने की सी बात थी. उससे १५० सालों में २०० से बड़े अंको का विभाजन नहीं किया जा सका. फिर रामानुजन ने गणितज्ञों को टेलीस्कोप दे दिया... जिसमें दूर के ग्रहों और तारों को देखने की क्षमता थी.

रामानुजन की डायरी में एक लाइन थी जिसमें उन्होंने लिखा था "there appear to be corresponding properties in which the moduli are powers of 5, 7, or 11... and no simple properties for any moduli involving primes other than these three."  पर इसकी व्याख्या कर पाने के पहले ही ३२ वर्ष की उम्र में रामानुजन चल बसे.

कंप्यूटर और नए गणितीय खोजों के बावजूद रामानुजन के नोट्स गणितज्ञों के लिए विस्मय का कारण बने रहे और वो उस लाइन का मतलब ढूंढते रहे. फिर केन ओनो की टीम को पता लगा कि रामानुजन के टेलीस्कोप से जितना दिख रहा था उसके आगे ब्रह्माण्ड में देखने की जरुरत नहीं. क्योंकि उसके बाद यही fractalदुनिया फिर से अपने को दुहरा रही है. उन्होंने अंको के विभाजन में फ्रैक्टल का सिद्धांत पाया. ओनो कहते हैं कि रामानुजन का no simple properties फ्रैक्टल ही हैं. इस तरह पिछले महीने ये सवाल हल हो गया. फ्रैक्टल अपने आप को अनंत तक दुहराने वाले पैटर्न होते हैं और केन ओनो की टीम ने अंको के विभाजन में यही पैटर्न ढूंढ निकाला है. जिसकी मदद से उन्होंने एक बीजगणितीय सूत्र निकाला है अंको के विभाजन को निकलने के लिए.

चलते-चलते*: बताता चलूँ कि रामानुजन के बारे में हम जितना सुनते-जानते हैं उससे कहीं ज्यादा महान गणितज्ञ थे. इतिहास में एक बार पैदा होने वाले एक महर्षि की तरह. उनके बारे में ३ महीने पहले (उनके जन्मदिन पर) जोर्ज ऐंड्रूस का लिखा लेख है: The meaning of Ramanujan: Now and for the future. जो कुछ यूँ शुरू होता है:  In this paper we pay homage to this towering figure whose mathematical discoveries so affected mathematics throughout the twentieth century and into the twenty first. Whenever we remember Ramanujan, three things come most vividly to mind: (1) Ramanujan was a truly great mathematician; (2) Ramanujan's life story is inspiring; and (3) Ramanujan's life and work give credible support to our belief in the Universality of truth. We shall examine each of these topics in the next three sections. A careful examination of each topic should, at least, give us some inkling of the meaning of Ramanujan. (ऐंड्रूस को रामानुजन के नोट्स को ढूंढने का श्रेय जाता है. आजीवन वो रामानुजन के नोट्स पर काम करते रहे हैं.)

और दो महीने पहले ही खुद केन ओनो द्वारा अमेरिकन मैथेमेटिकल सोसाइटी में छपा ये आलेख: The last words of a genius. और अगर पढ़ सकें तो अपने भारत के इस अद्भुत गणितज्ञ के बारे में ये किताब जरूर पढियेगा. संघर्ष, बिडम्बना और प्रतिभा का अद्भुत संगम: The Man Who Knew Infinity: A Life of the Genius Ramanujan.

*अगर आपने यहाँ तक पढ़ा है तो बता दूं कि चलते-चलते के बाद के जो लिंक हैं वो पढ़ने की कोशिश कीजियेगा. जहाँ गणित दिखे उसे छोड़कर अंग्रेजी वाले पैराग्राफ ही सही. अच्छा लगेगा, इसकी गारंटी Smile वैसे रामानुजन पर कभी फुर्सत में ढेर सारे पोस्ट लिखने का मन है.

~Abhishek Ojha~

तस्वीर: गणितीय सूत्र से बना फ्रैक्टल. इसे मैंने कभी गणितीय रंगोली नाम देकर इसी ब्लॉग के लिए बनाया था, उस पोस्ट पर कुछ और भी हैं. खूबसूरत लगे तो देख आइये. इसे देखने में क्या लजाना? वैसे भी गणितीय है Smile

Sunday, February 13, 2011

अंकों के देश में !

गणित का मतलब हम अक्सर अंको से ही लगाते हैं. गणित माने जोड़, घटाव, गुणा और भाग. हमें लगता है बस यही है गणित. पर ये गणित तो बस अंको का गणित है. गणित तो बिन अंको के भी होता है। ... चलिये इसे हम अंकगणित कहते हैं. पर वास्तव  में अंको का गणित भी इन अंकों तक ही नहीं है. संख्या सिद्धांत या नंबर  थियोरी अंकगणित से  कहीं अधिक विस्तृत होता है और इसमें अंको के गुण और उससे जुड़े नियम होते हैं. कुछ दिनों पहले मैथफेल नामक ब्लॉग पर आई ये तस्वीर मुझे बहुत पसंद आई थी. आज चलते हैं अंकों के देश में. पर जैसा कि ये तस्वीर कहती है अंकगणित गणित नहीं है ! Arithmetic-Mathematics

वैसे गणित की सीधी सी परिभाषा तो ये हैं कि जो आसानी से समझ में आ जाए वो गणित नहीं हैSmile  जैसे अंको तक का गणित आसानी समझ में आ जाता है तो गणितज्ञ उसे गणित ही नहीं मानते. अंको के लिए उन्होंने संख्या सिद्धांत बनाया. वैसे ही पिछली पोस्टों में जब गणित की खूबसूरती पर चर्चा चली थी तो मैंने लिखा था कि गणितज्ञ गणित के उन सिद्धांतों को गणित ही नहीं मानते जिनका उपयोग होने लगता है असली गणित को तो वो साश्वत सत्य की खोज और कविता सा मानते हैं. अब ये अलग बात है कि कहने वाले उसे ये कहते हैं कि अँधेरे कमरे में बैठ कर काली बिल्ली ढूंढने के सामान है ये गणित.... और मजे की बात है कि वो बिल्ली उस कमरे में  होती नहीं ! पर ये तो हुई मजाक की बात. संख्या के सिद्धांत में अंको के नियम और नियमों से अंक बनाए जाते हैं. नहीं-नहीं मैंने गलत टाइप नहीं किया नियमों से अंक भी बनाए जाते हैं. अब एक नए तरह के अंकों की एक नयी ही दुनिया होती है. उसके अपने नियम होते हैं और उनको आपस में जोडने घटाने और गुणा भाग करने के नियम भी नए होते हैं.

अंको से हमारे दिमाग में जो सबसे पहले अंक आते हैं उन्हें पूर्ण अंक (...३,-२,-१,०,१,२,३,...) कहते हैं या प्राकृतिक संख्याएं (१,२,३...) सम, विषम, रूढ़ इत्यादि अंको के कुछ मौलिक गुणों के आधार पर अंको का वर्गिकरण होता है। जैसे जो संख्या 2 से विभाजित हो वो सम संख्या जो न हो वो विषम, जो किसी से भी विभाजित ना हो वो रूढ़। ये सभी गिनती वाले अंक हैं अब ये एक बड़े परिवार का हिस्सा हैं जिन्हे परिमेय अंक (रेशनल) कहते हैं।  जैसे १/४,२/३,५/१ इत्यादि. अब आपने बट्टा या भिन्न के सवाल पढे होंगे। इनके अपने नियम हैं... अब इन परिमेय अंको के पड़ोसी अंक होते हैं अपरिमेय अंक। बहुत करीबी पड़ोसी… एक दूसरे के आजू-बाजू रहने वाले लेकिन दोनों के गुण आपस में नहीं मिलते। इनकी समस्या ये है कि इन्हें भिन्न या बट्टे में नहीं लिखा जा सकता। अब कितने भी करीबी पड़ोसी हों ये भिन्न नहीं होंगे तो अभिन्न कहना ही पड़ेगा। तो इस तरह बने परिमेय के पड़ोसी अपरिमेय !

ये सारे परिमेय और कुछ अपरिमेय जिस मुहल्ले में रहते हैं उसका नाम हुआ बीजगणितीय मुहल्ला. विभाजन के बाद कुछ अपरिमेयों ने परिमेयों के साथ रहने का फैसला किया होगा Smile तो इन सबको एकसाथ बीजगणितीय अंक कहते हैं। बीजगणितीय मुहल्ले वालों का एक गुण ये होता है कि वे सभी एक खास तरह के समीकरण के हल (मूल) होते हैं। अब जो ऐसे समीकरणों के हल नहीं हो पाते वो बाजू के मुहल्ले में रहते हैं और उन्हें इस जटिल मुहल्ले वालों को ट्रैन्सन्डेन्टल अंक कहते हैं। बीजगणितीय और जटिल अंकों को मिलकर वास्तविक अंक नामक जिला बनता है।

अब आप कहेंगे सारे नंबर तो हो गए जिले तक ही। पर असली अंक तो अब चालू होते हैं ! इन जिलों के मण्डल को अतिवास्तविक या हाइपररियल अंक कहते हैं। इनके गुण का तो वही सिद्धान्त है कि जो किसी राज्य के निवासी का होता है वो पहले देशवासी है। पहले भारतीय फिर बिहार, बंगाल। तो उसी तरह जो अतिवास्तविक के गुण है वो वास्तविक के होंगे ही।  इसके बाद आते हैं समिश्रित अंक याने काम्प्लेक्स अंक। वास्तविक और काल्पनिक अंको के जिलों को मिलकर बना समिश्र प्रांत। काल्पनिक अंक माने आई लगे अंक। जैसे 1+2आई. आई का मतलब होता है ऋणात्मक अंक का वर्गमूल... वही वाला वर्गमूल जिसके बारे में हम बचपन में पढ़ते हैं कि केवल धनात्मक अंको का ही वर्गमूल होता है। यहाँ भी चकमा दे गए न गणितज्ञ पढ़ा दिया कि धनात्मक अंको का वर्गमूल होता है और फिर पता चला कि ऋणात्मक का भी वर्गमूल होता है ! तो भैया इसका मतलब ये है कि गणित देश के छपरा से आगे ही नहीं जाएँगे तो पता कैसे चलेगा कि लखनऊ भी कोई जगह है ? दिल्ली, लंदन तो अभी दूर है ही।

अब इन मिश्रित संख्याओं के प्रांत को बढ़ा दें तो बृहतसमिश्रित प्रांत का नाम हुआ क्वाटरनायन। अब इस बृहत क्षेत्र में रहने वाले अंको की एक मजेदार आदत होती है कि एक को दूसरे से गुणा कर दो तो वही नहीं आता जो दूसरे को पहले से गुणा करने पर आता है। यानि यहाँ 2X3 अगर 6 होता है तो 3X2 कुछ और होगा ! अब अलग-अलग जगह के लोगों के अपने अपने तरीके हैं। वैसे ही इन अंको के अभी अपने नखरे हैं. ये समिश्रित अंको का एक तरह से 2 डायमेशन से तीन डायमेंशन में विस्तार है।

इस बृहत् प्रान्त के बाहर आते हैं ओक्टोनायन. इनके रंग, गुण और नखरे तो और भी अजीब होते हैं। यहाँ भी दो का आपसी गुणा आगे की जगह पीछे से कर देने पर अलग हो जाता है तो तीन अंक लेकर अगर पहले दो को गुणा करने के बाद तीसरे से गुणा किया जाय तो वही नहीं आता जो पहले आखिरी दो को गुणा करने के बाद पहले से गुणा करें ! आप ये कहें कि ओझवा बौरा गया है और अब गुणा भाग भी भूल गया. इसके पहले मैं ये सैर बंद कर देता हूँ Open-mouthed smile  फिर चलेंगे कभी अभी आप हवा खा के आइये.

~Abhishek Ojha~

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ये ब्लॉग बंद सा हो गया था. धन्यवाद अनूपजी का जो उन्होंने आज याद  और हमने एक पोस्ट ठेल  दी. आपने झेला हो तो मेरे साथ उन्हें भी कोस लीजियेगा और जो धन्यवाद देना हो तो मुझे दे जाएँ. झूठा ही सही Smile