Monday, September 26, 2011

पाई बनाम टाऊ ! - गणित के कठिन  होने का एक कारण?

‘पाई गलत है !’

- इस नाम का एक आलेख और ‘टाऊ मैनिफेस्टो’ नामक एक अन्य दस्तावेज इन्टरनेट पर पिछले कुछ महीने में बहुत लोकप्रिय हुए हैं। इनका कहना है कि पाई गलत है ! और उसकी जगह टाऊ का उपयोग होना चाहिए।

टाऊ के समर्थकों का कहना है कि अगर पाई की जगह टाऊ इस्तेमाल करें तो गणित, भौतिकी इत्यादि में जहां कहीं भी पाई का इस्तेमाल होता है वो सब कुछ समझने में ज्यादा आसानी होगी और सब कुछ ज्यादा तर्कसंगत और इंट्यूटिव लगेगा।

पाई जो सदियों से गणित का सबसे लोकप्रिय अंक और प्रतीक रहा है को इन दस्तावेजों में गलत करार दिया गया है. सबसे पहले आपको काम की ही बात बता दूँ यहाँ पाई गलत होना (Pi is wrong !) कहना थोड़ा भ्रामक है। वास्तव में ये भी यह नहीं कह रहे कि पाई गलत है - बल्कि यह कि पाई अव्यवहारिक है। वैसे ही जैसे अपनी नाक को पकड़ना हो तो हाथ को गर्दन के पीछे से घुमाकर भी यह काम किया जा सकता है पर जब आसानी से नाक पकड़ी जा सकती है तो इतना करने का क्या लाभ? टाऊ समर्थकों के अनुसार टाऊ गणित समझने को थोड़ा आसान बनाता है - पाई थोड़ा कठिन !

पाई का अर्थ होता है वृत्त की परिधि और व्यास का अनुपात। टाऊ का अर्थ है वृत्त की परिधि और त्रिज्या का अनुपात। अर्थात टाऊ हुआ पाई का दोगुना ! बस इतनी सी बात है - पाई की जगह टाऊ बट्टे दो लिख देना है। और टाऊ का मान पाई का दोगुना अर्थात ६.२८...।

इससे गणित और साथ ही दूसरे किसी विज्ञान का कोई भी नियम नहीं बदलेगा। बस इतना होगा कि गणितीय सूत्र यथा नाम तथा गुण के थोडे करीब हो जाएँगे। और इस प्रकार गणित के नियम समझने में थोड़ी आसानी होगी।

अभी अधिकतर सूत्रों में २*पाई लिखना पड़ता है। टाऊ का इस्तेमाल करने पर बार बार २ नहीं लिखना पड़ेगा। बात बस इतनी सी ही नहीं है - एक पूर्ण फेरे से बने कोण को अभी हम २*पाई कहते हैं, आधे को पाई और एक चौथाई को पाई बट्टे २ इत्यादि। अगर हम एक फेरे से बने कोण को टाऊ कहने लगें तो आधे के लिए टाऊ बट्टे २ और चौथाई के लिए टाऊ बट्टे ४ कहेंगे जो ज्यादा इंट्यूटिव है। अगर हम पाई की जगह टाऊ लिखने लगें तो आश्चर्यजनक रूप से इंट्यूटिव लगने के अलावा गणित, भौतिकी और अभियांत्रिकी के कई कठिन सूत्र भी आसान हो जाएँगे ! जैसे गणित का वो खूबसूरत समीकरण जिसकी चर्चा इस पोस्ट में है वो कुछ यूं हो जाएगा... image

इन दो दस्तावेजों में इसे बखूबी समझाया गया है।

१॰ पाई इज रोंग

२. टाऊ मैनिफेस्टो

इन्हें नहीं पढ़ना हो तो कोई बात नहीं लेकिन ये वीडियो जरूर देखें। ये लड़की गणित बहुत जल्दी में अच्छे से पढ़ाती है। ...असली 'क्यूट' मार्क देखकर ही गणित पढ़ना हो तो कुछ कुछ इसी टाईप का ही होगा :)

अंत में काम की बात: आगे से कभी बात चले तो कहिएगा कि गणितज्ञों ने ही उलटा पढ़ा दिया नहीं तो गणित तो सच में बहुत हल्का होता है। हमें तो बस पाई की जगह टाऊ पढ़ा दिया होता तो हम भी आज....!  बात बस इतनी सी थी और...

वैसे इसके खिलाफ पाई समर्थकों ने भी पाई का मैनिफेस्टो बनाया है। और उधर जैसे ३/१४ (१४ मार्च) को पाई डे मनाया जाता है उसी तर्ज पर ६/२८ (२८ जून) को ताऊ डे मनाया जाने लगा है। आप पढ़ के आइये बहुत रोचक लिंक हैं।

~Abhishek Ojha~

इस पोस्ट को लिखवाने के लिए 'ब्रह्मांड निवासी - अन्तरिक्ष विचरईया' आशीषजी का शुक्रिया।

इस ब्लॉग के पोस्ट पर (इरिसपेक्टिव ऑफ अपडेट फ्रेक्वेंसि ऐंड क्वालिटी ऑफ पोस्ट) जरूर प्रतिक्रिया देने वाले डॉ अमर कुमार को ये ब्लॉग हमेशा बहुत मिस करता रहेगा। और इस बहाने उनसे होने वाली बातचीत को मैं :(

Sunday, June 12, 2011

एक ख़ूबसूरत समीकरण

बचपन में गणित की कक्षाओं में पढ़ाया जाता है वर्ग और वर्गमूल. वर्ग अर्थात किसी संख्या को उसी संख्या से गुणा कर दिया जाय तो वर्ग निकल आता है. फिर पढ़ाया जाता है घात अर्थात किसी संख्या के ऊपर जितने का घात हो संख्या को खुद के साथ उतनी बार गुणा. फिर वर्गमूल, घनमूल इत्यादि. साथ में ये बताया जाता है कि वर्गमूल केवल धनात्मक संख्याओं का ही होता है. इन्हीं दिनों ज्यामिति में परिचय होता है वृत्त के परिधि, त्रिज्या से होते हुए ‘पाई’ नामक संख्या से भी. पाई किसी भी वृत्त के परिधि और व्यास के अनुपात से प्राप्त संख्या को कहते हैं. फिर थोडा और आगे बढ़ने पर लघुगणक (लॉगरिदम) पढ़ते हुए परिचय होता है एक और संख्या ‘इ’ से. (वैसे शायद इस संख्या से पहला परिचय कैलकुलस पढते हुए होता है). पाई और ई गणित ही नहीं विज्ञान और अभियांत्रिकी की हर शाखा में खूब इस्तेमाल किये जाने वाले अंक हैं. गणितीय शब्दावली में दोनों अपरिमेय और ट्रान्सेंडैंटल हैं. दशमलव के रूप में लिखा जाय तो दोनों अनंत तक जाते हैं…

फिर गणित पढते हुए एक दिन एक काल्पनिक संख्या आई से परिचय होता है. और इस संख्या से एक अलग अध्याय चालु होता है मिश्रित संख्याओं का. इन्हीं दिनों ये पता चलता है कि बचपन में पढ़ी गयी बात ‘वर्गमूल केवल धनात्मक संख्याओं का ही होता है’ उन्ही लोगों के लिए पढाई जाती हैं जिन्हें गणित बस जोड़-घटाव तक ही पढ़ना होता है. और -१ के वर्गमूल जिसे ‘आई’ भी कहते हैं के साथ एक नयी काल्पनिक दुनिया का आरम्भ होता है. ये काल्पनिकता भी खूब इस्तेमाल होती है. पाई, इ और आई संभवतः विज्ञान और अभियांत्रिकी के सबसे अधिक लिखे जाने वाले गणितीय अंक चिह्न अंक हैं.

इन तीनों अंको के साथ अगर जोड़-घटाव,गुणा-भाग आता हो तो इस समीकरण मेंeuler's equation इसके अलावा कुछ और नहीं है. लेकिन इस समीकरण का मतलब क्या है? महान गणितज्ञ ओय्लर का दिया गया ये समीकरण गणित का सबसे खूबसूरत समीकरण कहा जाता है. (समीकरण चित्र में)

विकिपीडिया क एक पैराग्राफ कुछ यूँ कहता है इस समीकरण के बारे में:


मैथेमेटिकल इंटेलीजेंसर पत्रिका के पाठकों के बीच कराये गए मत के अनुसार ओय्लर का तादात्मय ‘गणित का सबसे खूबसूरत प्रमेय’ है. इसी तरह फिजिक्स वर्ल्ड पत्रिका के पाठकों ने भी २००४ में इसे मैक्सवेल के विद्युत चुम्बकत्व के समीकरण के साथ ‘सर्वकालिक महानतम समीकरण’ चुना. २००६ में न्यू हम्प्शायर विश्वविद्यालय में गणित के प्रोफ़ेसर पॉल नहीन ने इस समीकरण  पर ४०० पन्नों की ‘डॉ. ओय्लर'स फैबुलस फोर्मुला’ नामक किताब लिखी. इस पुस्तक में उन्होंने इसे ‘गणितीय सुंदरता का सुनहरा मानक’ होने की संज्ञा दी. कोंसटेंस रीड ने इसे ‘सम्पूर्ण गणित का सबसे प्रसिद्द सूत्र’ कहा. कहते हैं एक बार गणितज्ञ गॉस ने टिपण्णी की कि अगर ये सूत्र किसी गणित के छात्र को बताते ही अगर स्पष्ट रूप से समझ में ना आये तो वो छात्र कभी उत्कृष्ट गणितज्ञ नहीं बन सकता. उन्नीसवीं सदी के विख्यात दार्शिनिक, गणितज्ञ और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर बेंजामिन पियर्स ने एक व्याख्यान में इसे साबित करने के बाद कहा: ‘ये पूर्णतया विरोधाभासी है, हम इसे समझ नहीं सकते, हमें नहीं पता कि इसका अर्थ क्या है लेकिन चूँकि हमने इसे सिद्ध किया है तो हम जानते हैं कि ये सच है.’ स्टैंफर्ड विश्वविद्यालय के गणितज्ञ प्रो कीथ डेवलिन ने कहा ‘जैसे शेक्सपियर की एक लंबी कविता प्रेम के असली तत्व को कैद करती है, जैसे एक चित्रकार गहरी मानवीय सुंदरता को उकेरता है वैसे ही ओय्लर का समीकरण अस्तित्व  की गहराई तक पंहुचता है’. [ये पूरा पैराग्राफ विकिपीडिया के एक पैराग्राफ का अनुवाद है. बुरे अनुवाद के लिये हमारी तरफ से ‘सॉरी’ रहेगा.]

एक अंक जो दशमलव में लिखने पर अनंत तक जाता है वो वृत्त के परिधि और व्यास से आया. साथ में एक वैसी ही अजीबो गरीब संख्या ‘इ’. ‘आई’ जो कि काल्पनिक है. और ओय्लर ने कहा कि ‘इ’ पर अगर ‘आई’ और ‘पाई’ के गुणनफल का घात लगा दें तो वो -१ हो जाएगा ! इतने अजीबो गरीब मिलन का इतना साधारण परिणाम ‘१’.

सबसे पहले तो हमने यही पढ़ा होता है कि किसी भी धनात्मक संख्या पर अगर किसी धनात्मक या ऋणात्मक संख्या का घात लगाएं तो परिणाम ऋणात्मक नहीं होता. अगर साधारण तरीके से सोचें तो एक काल्पनिक संख्या और ‘पाई’ के गुणनफल का कुछ अर्थ हो सकता है क्या? फिर ‘इ’ और उसके ऊपर ये विकट काल्पनिक घात. अगर बचपन की पढ़ी बात से समझें तो ‘इ’ को ‘इ’ से ही गुणा करना है, लेकिन कितनी बार? ‘एक काल्पनिक संख्या से गुणा किये हुए अनंत तक जाने वाली संख्या के गुणनफल के बराबर?’ ! विचित्र ! और इस विकटता का हल अत्यंत ही साधारण याने -१. (अगर e(x) का विस्तार और त्रिकोणमिति के sin(x) और cos(x) के विस्तार पता हों तो इसका प्रमाण भी ऐसा ही साधारण होता है.)

विकटता के मिश्रण से उपजी सरलता इस समीकरण को खूबसूरत बना देती है. मुझे अपने एक पुराने मॉडर्न आर्ट पर लिखे गए पोस्ट की याद आ रही है. अगर आपने यहाँ तक पढ़ा है तो इस समीकरण पर बने कुछ कार्टून भी देखते जाएँ. मैं क्या कहूँ. अपने काजल कुमार जी बेहतर व्याख्या कर पायेंगे कार्टूनी सुंदरता.


389-beautye_to_the_pi_times_i
आई और पाई पर पर एक ये भी:

numbers


~Abhishek Ojha~

Sunday, May 29, 2011

आंद्रे ब्लॉक: एक खतरनाक ज्ञानी


रामानुजन के मार्गदर्शक और जी एच हार्डी के सहयोगी जे ई लिटिलवूड ने एक बार कहा था: 'गणित एक खतरनाक पेशा है, और हम गणितज्ञों में से एक अच्छा ख़ासा हिस्सा  पागल हो जाता है'.

आंद्रे ब्लाक (Andre bloch) पिछली सदी के एक प्रसिद्द फ़्रांसिसी गणितज्ञ थे. मिश्रित फलन के सिद्धांतों (complex function theory) पर दिया गया उनका 'ब्लॉक प्रमेय' गणित के खूबसूरत प्रमेयों में आता है. आंद्रे ब्लॉक  के बारे में कई विरोधाभासी कहानियाँ प्रसिद्द हैं. उन्होंने कई प्रसिद्ध गणितज्ञों के साथ पत्राचार तो किया पर कभी किसी से मिले नहीं. कहते हैं जोर्ज पोल्या ने जब उन्हें ज्यूरिक बुलाया तो उन्होंने ये कह दिया कि उनकी स्थिति ऐसी नहीं कि वो ज़्यूरिक आ सकें.  जब पोल्या उनके बताए पते पर पँहुचे तो पता चला कि वो एक पागलखाने का पता था. पोल्या उस पागलखाने  के दरवाजे से लौट आये. (वैसे बाद में पोल्या ने ऐसी किसी घटना के होने से इनकार किया.) एक और अजीब बात ये थी कि आंद्रे अपनी चिट्ठियों में दिनांक एक अप्रैल ही लिखते थे.

यहूदी परिवार में घडीसाज पिता के पुत्र आंद्रे अपने छोटे भाई के साथ एक ही कक्षा में पढते थे. कहते हैं आंद्रे के भाई ने जहाँ अच्छे अंक प्राप्त किये वहीँ आंद्रे अपनी कक्षा में आखिरी स्थान पर आये. पर फ़्रांसिसी गणितज्ञ अर्नेस्ट वेसीयट द्वारा लिए गए मौखिक परीक्षा के उन्हें २० में से १९ अंक प्राप्त हुए और उन्हें इकोल पोलीटेक्निक में नामांकन मिल गया. एक साल के भीतर ही प्रथम विश्वयुद्ध के चलते दोनों भाइयों  को पढाई छोड कर सेना में भर्ती होना पड़ा. कुल मिलकर यहीं तक पढाई की आंद्रे ने. इसके बाद के ३१ साल का शेष जीवन पागलखाने में गुजारते हुए उन्होंने गणित पर अद्भुत शोध किये. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान कुछ समय तक फ़्रांस का वो हिस्सा नाजी जर्मनी के कब्जे में था और इस दौरान आंद्रे ने अपनी यहूदी पहचान छुपाने के लिए छद्म नामों से भी शोध छपवाए.

उनके पागलखाने तक पहुचने के कारणों पर भी मतभेद तो थे पर सभी मतभेदों में एक बात सामान थी और वो थी नृशंस हत्या !

कुछ लोगों का कहना था कि उन्होंने अपने मकान मालकिन और सास की हत्या इसलिए कर दी क्योंकि वो बहुत शोर करती थी और इससे उनके काम में बाधा पड़ती थी. कुछ ने ये कहा कि उन्होंने अपने भाई से ईर्ष्या के चलते उसकी हत्या कर दी. क्योंकि उनका भाई उस समय एक विद्यालय खोलने की योजना बना रहा था. कुछ ने  मंगेतर तो कुछ ने पत्नी की हत्या की बात की. कई लोगों ने धार्मिक बहस को इसका कारण माना.

कुछ किस्सों के अनुसार विश्वयुद्ध से लौटे फौजी अफसर होने के नाते उनकी इज्जत थी और इसी बात के चलते हत्यारा होने पर भी उन्हें मानसिक रोगी बताकर उन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया गया. २४ वर्ष की उम्र से लेकर १९४८ में मृत्यु तक वो मानसिक अस्पताल में ही रहे. हत्या की इस घटना के अलावा आंद्रे को एक शांत और मिलनसार व्यक्ति के रूप में जाना जाता था. लेकिन जो व्यक्ति हत्या कर दे… अपने ही परिवार के कई लोगों का उसका मिलनसार और विद्वान  होना किस काम का ? !

कई कल्पित कथाओं के बाद कुछ शोध, चिट्ठियों और आंद्रे के सबसे छोटे भाई की लिखी किताब में बातें थोड़ी अलग हैं. उस हिसाब से आंद्रे युद्ध में घायल हो जाने के कारण कुछ दिन अस्पताल में बिताने के बाद सेना के लिए अक्षम घोषित होने के बाद घर लौटे थे और उनके भाई के सर में गोली लग गयी थी जिससे उनकी एक आँख भी चली गयी थी. फिर एक दिन खाना खाते समय आंद्रे ने अपने भाई, चाचा और चाची की हत्या कर दी. इसके बाद वो चिल्लाते हुए बाहर निकल गए और अपने आपको पुलिस के हवाले कर दिया. जहाँ से उन्हें मानसिक अस्पताल भेज दिया गया.

फ्रेंच अकादमी ऑफ साइंस ने उन्हें १९४८ के बेक्वेरेल पुरस्कार के लिए चुना था जो उन्हें  उसी साल मरणोपरांत प्रदान किया गया. बिना किसी उच्च औपचारिक शिक्षा के आंद्रे ने गणित की कई शाखाओं पर शोध किया और कई गणितज्ञों के साथ शोधपत्र भी छपे. मुख्यधारा  और दुनिया से पूरी तरह अलग रहने के बावजूद सीमित किताबों और पत्रों के माध्यम से वो गणित के विकास पर काम करते रहे.

उस समय के अस्पताल के मुख्य मनोवैज्ञानिक बरुक ने बाद में बिना आंद्रे का नाम लिए ‘चार्लटन का गणितज्ञ’ नाम से छपे लेख में लिखा कि आंद्रे  ‘तर्कसंगत मानसिकता के रोगी’ थे. उनका तर्क था कि ये उनकी जिम्मेवारी थी कि परिवार के सुजनन (eugenic duty) के लिए उसकी एक शाखा को खत्म कर दिया जाय जो उनके हिसाब से दूषित थी. कई सालों के बाद अपने सबसे छोटे भाई से मिलने के बाद उन्होंने डॉक्टर को एक बार बताया कि ‘ये सब एक गणितीय तर्क पर आधारित है. मेरे परिवार में पहले मानसिक रोगी रहे हैं और उसे खत्म कर देने के लिए परिवार की एक शाखा को तर्क के हिसाब से खत्म हो जाना चाहिए. मैंने इसके लिए जो काम शुरू किया था वो अभी खत्म नहीं हुआ है’. उन्होंने डॉक्टर से ये भी कहा कि उनके तर्क में भावना का कोई स्थान नहीं और इसके लिए उन्होंने अलेक्जन्द्रिया की प्रसिद्ध गणितज्ञ हिपाटिया के सिद्धांतों का प्रयोग किया.

हिपाटिया पहली प्रसिद्द महिला गणितज्ञ के रूप में भी जानी जाती है. ईसाई कट्टरपंथियों ने ४१५ ई. में हिपाटिया की हत्या कर दी.  शिष्यों के लिखे कुछ लेखों और पत्रों के अलावा हिपाटिया का कोई दर्शन बचा नहीं है. और कोई भी ये अनुमान नहीं लगा पाया कि आंद्रे ने किस सिद्धांत की बात की होगी. वैसे काफी बाद में लिखे गए एक उपन्यास में एक अनुच्छेद मिला जिसमें यह लिखा गया था कि हिपाटिया ने एक नरसंहार पर  कहा की उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता जब तक कुछ अर्ध-जानवर जिस मिटटी से आये थे अगर उसी मिटटी में कुछ साल पहले चले जाएँ और उससे दुनिया का पुनर्निर्माण और एक महान व्यवस्थित समाज बने.

लोग ये नहीं मान पाते कि एक उपन्यासकार की ऐसी कल्पित बात से आंद्रे प्रभावित हुआ हो. ये बिडम्बना ही होगी कि एक गणितीय विद्वान जिसे इस हत्या को छोड़ दें तो बहुत ही शांत और दयालु इंसान के रूप  में देखा गया एक उपन्यास से इस तरह प्रभावित हो जाए. मानसिक अस्पताल के एक छोटी सी जगह में एक मेज पर काम करते रहने वाला आंद्रे अक्सर उस जगह को छोड़ अन्य जगहों पर भी जाने से मना कर देता. ‘गणित मेरे लिए पर्याप्त है’ कह कर टाल देने वाले आंद्रे के सबसे छोटे भाई की लिखी किताब के अनुसार वह बस अस्पताल में गणित के अलावा बस शतरंज खेलता और अत्यंत ही विनम्र किस्म का इंसान था जिसे अस्पताल के कर्मचारी एक आदर्श मरीज के रूप में देखते थे.

आंद्रे पत्रों में अपने पते के नाम पर बस मकान संख्या और गली का नाम दिया करता और ये कभी नहीं लिखता कि वो मकान नंबर वास्तव में एक मानसिक अस्पताल है. आंद्रे आजीवन कभी किसी गणितज्ञ से नहीं मिला. पारिवारिक, धार्मिक सुजनन के नाम पर कई नरसंहार हुए हैं. आंद्रे ने पता नहीं किस तर्क से परिवार वालों की हत्या कर दी. कोई भी तर्क मानव हत्या को उचित नहीं ठहरा सकता. वैसे ये एक रहस्य ही है कि ऐसा क्या था जिसने आंद्रे को ऐसा जघन्य अपराध करने को प्रेरित किया. मनोविज्ञान और गणितीय दर्शन दोनों के लिए अब भी ही ये एक रहस्य सा ही है.

~Abhishek Ojha~

१. Henri Cartan and Jacqueline Ferrand, The case of André Bloch

२. Douglas M. Campbell, Beauty and the beast: The strange case of andre bloch