Friday, July 25, 2008

सात साल में बना १००० पन्नों का हल (बातें गणित की... भाग IX)

पिछले पोस्ट में हमने देखा की किस तरह अनसुलझे सवालों का पिटारा तैयार हो गया और सारे अनसुलझे सवाल एक-दुसरे से जुड़े हुए थे. इस बीच विशेषज्ञों ने सलाह दी की पानी सर के ऊपर से जा रहा है और बेहतर होगा की अब नंबर थियोरी से ऊपर उठकर सोचा जाय. और लोग नए जोश से इस सवाल को हल करने में लग गए. अब एक और गणितज्ञ का परिचय हो जाय. एंड्र्यू वाइल्स (Andrew Wiles) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से गणित पढ़कर प्रिन्सटन पहुच गए पढाने, अभी भी वहीँ पढाते हैं...

इस दौरान एक सवाल हल हो गया. बर्कली स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के केन रिबेट (Ken Ribet) ने जीन पिएरे के एप्सिलोन अनुभाग (Epsilon Conjecture) को साबित कर दिया. ये ख़बर सुनकर एंड्र्यू वाइल्स ने तानिमाया अनुभाग हल करने की ठान ली... क्योंकि अगर ये हो गया तो फिर फ़र्मैट का अन्तिम प्रमेय भी हो गया. और फिर सात सालों तक सारे शोध कार्य छोड़कर एकांत में... वो काम करते रहे... केवल एक सवाल पर... गणित के महानतम सवाल पर. कुछ रिसर्च पेपर से, पर ज्यादातर ख़ुद के दिमाग से... वो काम करते रहे. कहते हैं की २ साल तक वो सवाल में अपने आपको डुबाये रहे ताकि एक स्ट्रेटजी सोच सकें.

तानियामा के अनुसार इलिप्टिक कर्व और मोडुलर फोर्म्स दोनों सेट एक ही हैं... यानी हर एक सदस्य के लिए दुसरे में वैसा ही सदस्य मौजूद है... पर समस्या ये की दोनों सेट में अनंत सदस्य ! गिनें तो कैसे गिनें? उन्होंने सहायता ली गैल्वास (Galois) के सिद्धांतों की. (गैल्वास की मजेदार के साथ-साथ दुखद कहानी जल्दी ही किसी पोस्ट में). गैल्वास के सिद्धांत ने कमाल किया और अब समस्या रह गई गैल्वास के सिद्धांत से मोडुलर फॉर्म के तुलना की. तीन साल में इतना हो पाया और ये बात कोई नहीं जानता था सिवाय एंड्र्यू की पत्नी के! इसके बाद कई सारे शोध और कईयों की थियोरी का इस्तेमाल किया एंड्र्यू ने. वो ये बातें किसी को नहीं बताते दो कारण थे एक ये की वो अपना ध्यान नहीं भंग करना चाहते थे और दूसरा ये... कौन कहे की आज के जमाने में भी लोग फ़र्मैट के अन्तिम प्रमेय पर काम करते हैं :-) वो ये बातें पत्नी के अलावा केवल अपने मित्र निक कट्ज़ (Nick Katz) को बताते थे.

और फिर १९९३ में न्यूटन इंस्टीच्युट ऑफ़ मैथेमेटिकल साइंसेस, कैम्ब्रिज में अपने गाइड द्बारा आयोजित कांफ्रेंस में उन्होंने व्याख्यान दिया 'इलिप्टिक कर्व, मोडुलर फॉर्म और गैल्वास रेप्रेसेंटेशन' पर. व्याख्यान में कई नए विचार प्रस्तुत किए गए पर न तो व्याख्यान के शीर्षक में न ही व्याख्यान में फ़र्मैट की चर्चा थी. जब व्याख्यान देते-देते वो अंत तक पहुचे तो सुनाने वालों के चहरे गंभीर हो गए थे... सबको लग गया था की अब कुछ बड़ा होने वाला है और फिर उन्होंने लिख दिया 'फ़र्मैट के अन्तिम प्रमेय का कथन' और लिख दिया हेंस प्रूव्ड !

और अगले दिन हर अखबार में ये ख़बर आई की अंततः प्रमेय सिद्ध हो गया !

एक कमिटी बनी लंबे चौडे हल की जांच के लिए और फिर निकली एक गलती... [गणित के प्रूफ़ में गलती होना तो आम बात है... उनकी तो हो गई. हम तो जान बुझ के कर दिया करते थे... जब प्रूफ़ नहीं आ रहा हो तो एक तरफ़ से बढ़ते-बढ़ते कहीं तक गए, दूसरी तरफ से चले तो कहीं और. फिर बीच में एक लाइन ऐसी होती थी जहाँ दोनों को बराबर दिखा देते :-) पर आईआईटी के प्रोफेसर कभी नंबर नहीं दिए... उत्तर पुस्तिका में जब How? Why? और So What? How Come? जैसी टिपण्णी लिखी मिल जाती तो चुप-चाप उत्तर पुस्तिका को मोड़ के रख लेते :(] इधर फिर वापस एंड्र्यू को लगना पड़ा सवाल पर... पर इस बार मामला इतना आसान नहीं था, पहले वो बिना किसी को बताये इस सवाल पर शान्ति से काम करते पर अब सबकी नज़रें इस पर लगी हुई थी... (गनीमत है 'आज तक' जैसे चैनल न थे अमेरिका में तब, नहीं तो बेचारे कुछ ना कर पाते). ध्यान नहीं लग पा रहा था और पहली बार एंड्र्यू ने किसी की मदद ली और उन्होंने अपने पूर्व छात्र टेलर को बुला भेजा. एक साल तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी... और फिर एक दिन, उन्हें समस्या दिख गई और उन्होंने उसे निपटा दिया. और फिर फ़र्मैट का अन्तिम प्रमेय पूरी तरह से हल हो गया.

पूरा हल १००० हजार पन्नो का हुआ... जो व्याख्यान 'न्यूटन इंस्टीच्युट ऑफ़ मैथेमेटिकल साइंसेस' में उन्होंने दिया था वही कुछ २०० पन्नो का था. तो फ़र्मैट ने अगर कहा था की किताब के हाशिये में कम जगह है तो क्या ग़लत कहा था ! पिछले पोस्ट की टिपण्णी में ज्ञानजी ने कहा की उनके उपनिदेशक ने इस सवाल को लेकर फील्ड्स मेडल के सपने दिखाए थे... तो क्या एंड्र्यू वाइल्स को फील्ड्स मैडल मिला? क्यों नहीं मिलेगा भाई, आख़िर उन्होंने गणित का महानतम सवाल हल किया था ! पर क्या और क्यों हुआ जानते हैं अगली पोस्ट में. (फील्ड्स मेडल गणित के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार के समान माना जाता है).

~Abhishek Ojha~

16 comments:

  1. कथा दिलचस्प थी। बाकी तो आप जानते ही हैं, गणित मेरे लिए क्या मायने रखता है :)

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  2. गनीमत है 'आज तक' जैसे चैनल न थे अमेरिका में तब, नहीं तो बेचारे कुछ ना कर पाते.

    हा हा!!

    बड़ा रोचक और दिलचस्प रहा पढ़ना, वाकई में..मन लगा कर पढ़ा.

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  3. प्रमेय की प्रूफ को ले कर इलाहाबाद के Pande जी की कारगुजारी याद आ रही है। एक प्रमेय सिद्ध करने के लिये उन्होंने चार-पांच स्टेप हल किये। उसके बाद गाड़ी नहीं चली। उन्होने अन्तिम स्टेप देखा तो बड़ा साफ सुथरा सा लगा।
    बस, दन्न से उन्होने लिखा कि यह प्रसिद्ध dePan's equation है। अत: सिद्ध!
    और परीक्षा में सही भी माने गये! कोई न पकड़ पाया कि dePan, Pande ही हैं।
    असली किस्सा तो ओरिजिनल इलाहाबादी बतायेंगे!

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  4. यार अभिषेक कहानी अच्छी बताई... गणित के Chapters के नाम पर मुझे केवल एक Mensuration chapter का नाम याद है.... बाकि पता नही यार जब पढता था तो लगता था कि क्या इसका कभी काम भी आएगा अब जब उम्र निकल गई तो केवल अफ़सोस भर कर पाता हू

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  5. सस्पेंस चाहिए तो गणित में घुस जाओ। जिधर जाओ सस्पेंस ही सस्पेंस मिलेगा, क्विंटलों सस्पेंस। इधर भी फर्मेट की पहेली हल हो गई। अब कैसे उस के बारे में अगली पोस्ट तक सस्पेंस।

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  6. दिनेश भाई

    कभी खाते बही की दुनिया में विचरण किजिये हमारे साथ-सस्पेन्स के साथ साथ हॉरर और स्टंट भी मिलेगा. :)

    कभी कभी रोमांस भी. हा हा!!

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  7. बहुत खूब.. मेरे घर मे मुझे छोड़कर सभी गणित के उस्ताद हैं.. एक मैं ही पापा, मम्मी, भैया, दीदी का नाम मिट्टी में मिला दिया हूं.. शायद आपका चिट्ठा पढकर कुछ अकल आ जाये.. वैसे अपने क्लास में मैं गणित का अच्छा छात्र माना जाता था.. मगर घर में फिसड्डी.. :)

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  8. आपके दिलचस्प अंदाज ने इस गणितीय कथा को मनोरंजक बना दिया. आपके पास तो लगता है गणितज्ञों व गणितीय कथाओं का भंडार है. आगे की कथाओं का इंतजार रहेगा - हमेशा.

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  9. बहुत ही कठिन पोस्ट है कसम से कुछ समझ नही आया.
    पुराणी तीन-चार पोस्टें भी पढ़ी पर नतीजा सिफर.
    अपन गणित में बहुत ज्यादा ही तेज हैं ना शायद आज तक से भी इसीलिए.

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  10. अभिषेक जी,
    ब्लोग्स की दुनिया में घुमते घुमते अचानक आप की पोस्ट पर नज़र पड़ी. जानकर अचरज हुआ कि फार्मट थेओरेम हल हो गई है. क्या इसका प्रूफ़ या प्रूफ़ का कुछ भाग कहीं देखने को मिल सकता है?

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  11. गणित पर आपके लेखन से ज्ञान दा भी कुछ इसी मूड में आते लगते हैं। हमें तो डर लग रहा है, कहीं दो कक्षाओं में पढ़ाई न चलने लगे :)

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  12. @
    ज्ञान जी.
    इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीएससी करते हुए स्टैट्स में एक पांडे जी मेरा भी पाला पड़ा था। पांच में तीस सवाल आते थे तो अच्छी तरह किया और बाकी दो में जबरदस्त भंजाई की। लेकिन पांडे जी पहले तीन जवाब से ऐसे झांसे में आ गए कि 50 में से 46 नंबर दे दिया। धन्य हैं पांडे जी। जाने अब कहां हैं?

    वैसे अभिषेक बाबू, गणित पर आप गजबै लिख रहे हैं। एकदम गदर काट रहे हैं।

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  13. ओझा भाई गणित को छोडे अरसा हो गया, लेकिन यह गणित हमे नही छोडता, अभी घर का गणित ठीक कर के, यहा बेठॊ तो आप का गणित , लेकिन बहुत ही रोचक ओर दिलचस्प, अगली कडी की इन्तजार

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  14. अजीत जी की पूरी टिपण्णी उधार ले ली समझ ले..... पर एक बात तय है कि अगर आप लोगो को गणित पढाने लगेगे तो विषय को दिलचस्प बना देंगे ....

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  15. गणित की मंजिल पाना अकेलापन है

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