Thursday, July 31, 2008

एक महिला गणितज्ञ के गणित प्रेम की दुखद कहानी ! (बातें गणित की... भाग XI)

प्रेम और दुःख का गहरा नाता है. जहाँ एक आ जाय दूसरा आ ही जाता है. और इस प्रेम में भी दुःख आया... महिला होने का अभिशाप भी. आप क्या सोच रहे हैं की जरूर भारत की कहानी होगी ! लेकिन ऐसा नहीं है... ये बात है फ्रांस की.

सोफी जर्मैन फ्रांस की एक महिला गणितज्ञ थी. पर दुर्भाग्य से उनका जन्म तब हुआ था (सत्रहवी शताब्दी) जब महिलाओं को यूरोप में समान अधिकार नहीं थे. बाकी सब तो ठीक लेकिन गणित पढ़ना औरतों के लिए खासकर बुरा माना जाता था. इसे पुरुषों का काम समझा जाता था. शायद यही कारण है की महिला गणितज्ञों की इतनी कमी रही है इतिहास में.

सोफी का जन्म एक अच्छे घराने में हुआ था और बचपन में वो अपने पिता के पुस्तकालय में बैठ कर पढा करती. इसी दौरान उन्हें एक किस्सा पढने को मिला. कहते हैं की आर्कीमिडिज (Archimedes) को एक सिपाही ने उस समय मार दिया जब वो ज्यामिति की कुछ संरचनाओं में लीन थे और उन्होंने सिपाही के सवालों का उत्तर देने की जरुरत नहीं समझी. शहर पर हमला हुआ था और वो गणित में लीन थे. इस किस्से से सोफी सोच में पड़ गई की जब कोई इस विषय में इस तरह तल्लीन हो सकता है तो जरूर इसमें कोई बात होगी. और उन्होंने गणित पढ़ना चालु किया. पर समस्या तब आई जब परिवार वालों को पता चला, परिवार वालों की पूरी कोशिश रही की ये गणित न पढ़े. तब के जमाने में यूरोप में ये काम लड़कियों के लिए बिल्कुल उपयुक्त नहीं समझा जाता था. तब लड़कियों को विश्वविद्यालयों में भी प्रवेश नहीं दिया जाता था. ख़ुद से पढ़ के भी क्या करती?

उनका गणित से प्रेम का ये आलम था की सोफी छुप कर घर के ऐसी जगहों पर गणित पढ़ा करती जहाँ कोई नहीं जाता. मोमबत्ती जला कर... फ्रांस में पड़ने वाली कड़ाके की ठंढ में भी वो जब घर के लोग सो जाते तो गणित पढ़ा करती. अपने प्यार के लिए तकलीफ सहती रही. घर वालों ने बाद में हार मान ली और परेशान करना छोड़ दिया. पर ये प्यार उन्हें इतनी आसानी से नहीं मिलने वाला था. गणित ख़ुद से पढ़ती तो ये कुछ पता नहीं होता की जो कर रही हैं सही है या ग़लत. ये भी नहीं पता होता था की जिन चीज़ों पर काम कर रही है कहीं वो पहले ही तो नहीं खोज लिए गए! ठीक उसी तरह जैसे रामानुजन, हार्डी से मिलने के पहले किया करते थे. कितना ही गणित वो ख़ुद लिख गए जिसकी खोज उस समय तक की जा चुकी थी. (रामानुजन की कहानी की तो श्रृंखला बन ही जायेगी, अभी उन पर एक और किताब पढ़ रहा हूँ. वो भी ख़त्म हो जाय तो लिखता हूँ). बिना औपचारिक शिक्षा के उन्हें कुछ पता ही नहीं था.

पर जहाँ चाह वहाँ राह ! उन्होंने एक नया तरीका निकाला... सेक्सपियर के ट्वेलव्थ नाईट की तरह उन्होंने एक ऐसे लड़के का छद्म नाम ले लिया जो पढ़ाई छोड़ चुका था, और वो उसके नाम से प्रश्न पत्रों का हल जमा कर देती. महान गणितज्ञ लैग्रंजे (Lagrange) ने जब उत्तरों को देखा तो उन्होंने सोफी को मिलने बुला भेजा और सोफी को अपना राज खोलना पडा. लैग्रंजे ने सोफी की तारीफ तो की पर फिर भी नियम के हिसाब से वो विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं ले सकती थी. इसी बीच सोफी एक और महान गणितज्ञ गॉस (Gauss) को अपने काम भेजती और गॉस पत्रों में जवाब दिया करते. यहाँ भी वो अपने छद्म नाम का ही इस्तेमाल करती. इस तरह कुछ दिनों तक चला पर ये बात भी ज्यादा दिनों तक नहीं चली. नेपोलियन ने गॉस के शहर प्रसिया (Prussia) पर हमला किया तो सोफी को बचपन वाली कहानी याद आ गई और उन्हें लगा कि कहीं आर्कीमिडिज वाली घटना गॉस के साथ भी न हो जाय. इसलिए उन्होंने अपनी एक सहेली को गॉस का ख़ास ध्यान रखने को कहा, उस सहेली ने गॉस को सब कुछ बता दिया. गॉस को बहुत आश्चर्य हुआ... की एक महिला भी गणित पर इतना अच्छा काम कर सकती है ! और उन्होंने सोफी को जो पत्र लिखा उसमें उनकी खूब प्रशंसा की. पर इस घटना के चंद दिनों बाद ही गॉस गोटिन्गेन विश्विद्यालय में खगोल शास्त्र के प्रोफेसर बन गए और गणित पर काम करना कम कर दिया और इसके साथ ही पत्र व्यवहार भी बंद हो गया.

पर समय के साथ सोफी का गणित प्रेम और संघर्ष जारी रहा... वो फ्रेंच गणित अकादमी में अपने काम को भेजती तो... काम उच्च कोटि का होते हुए भी उसमें कई छोटी-छोटी गलतियाँ होती. ऐसा अक्सर गणित में होता है पर अगर साथ में काम करने वाले होते हैं तो चर्चा और सुझाव से ये गलतियाँ हटाई जाती हैं. पर उन्हें मदद करने वाला कोई न था. फिर भी अंततः एक ऐसा समय आया जब वो अकादमी की बैठक में जाने वाली पहली ऐसी महिला बनीं जो किसी गणितज्ञ की पत्नी नहीं थी. इन सबके साथ गॉस ने उन्हें मानद डिग्री देने की सिफारिस भी की... उन्हें ये दी जाने वाली थी पर उसके पहले ही वो दुनिया छोड़ चली.

आज वो पहली महिला गणितज्ञ के रूप में जानी जाती हैं जिसने अच्छे और उपयोगी प्रमेयों की खोज की. सोफी लिखित कुछ दस्तावेजों से ये भी बात सामने आई की फ़र्मैट के प्रमेय पर उनकी सोच सही दिशा में थी. जहाँ उस समय के सारे गणितज्ञ किसी एक ख़ास अंक के लिए प्रमेय को साबित करने की कोशिश करते वहीँ सोफी ने एक विस्तृत सोच से शुरुआत की और कई सारे सिद्धांतों की मदद से पूरा प्रमेय एक साथ हल करने की कोशिश की. पर दुर्भाग्य न औपचारिक शिक्षा मिल पायी ना ही किसी गणितज्ञ का सहयोग... इतिहास के पन्नों में ऐसी कितनी ही प्रतिभाएं दफ़न हो गयीं... कारण बस यही था की वो महिला थी. नहीं तो आज उनका नाम कहीं और होता.... और पहली महिला गणितज्ञ होने के खिताब के साथ-साथ मुख्य धारा के महान गणितज्ञों में भी उनकी गिनती होती.

~Abhishek Ojha~

चित्र साभार: http://www.agnesscott.edu/lriddle/women/germain.htm

Tuesday, July 29, 2008

एंड्र्यू वाइल्स, फील्ड्स मेडल और एक महिला गणितज्ञ (बातें गणित की... भाग X)

पिछले पोस्ट में हमने देखा की किस तरह एंड्र्यू वाइल्स ने सात सालों की कठिन मेहनत के बाद एक बड़ा सा हल निकाला. ये उस सवाल का हल था जिसे हल करने की कोशिश अब तक के सबसे महान गणितज्ञ कर चुके थे. एंड्र्यू वाइल्स ने कितनी मेहनत की थी इसका अंदाजा तो आप पिछले पोस्ट पर उनकी तस्वीर देखकर ही लगा सकते हैं. एंड्र्यू वाइल्स ने गणित का महानतम सवाल हल किया और एक सवाल के हल ने उन्हें महान गणितज्ञों की श्रेणी में ला खड़ा किया. पर गॉस, ओय्लर जैसे गणितज्ञ क्या इनसे कमजोर थे? ऐसे सवाल तो उठने ही नहीं चाहिए पर लोग उठाते हैं. और मेरे जैसे जो गॉस की विद्वता के घोर प्रसंशक हैं वो यही कहते हैं कि न तो गॉस ने सात साल तक इस सवाल पर काम किया और ना ही तब गणित इतना विकसित था. हाँ ये बात और है की अगर गॉस ने ७ सालों तक इस सवाल पर काम कर दिया होता तो आज नंबर थियोरी की कई शाखाएं होती. गॉस की विद्वता तो आगे कई पोस्ट में आएगी ही. पर एंड्र्यू वाइल्स की विद्वता भी अतुलनीय है और ऐसे विवाद सही में कोई मायने नहीं रखते. एंड्र्यू वाइल्स अपने गणित के अनुभव के बारे में कहते हैं:

अगर मुझे गणित पर अपने अनुभव के वर्णन करने को कहा जाय तो शायद मैं कहूं की यह एक अंधेरे कमरे में प्रवेश करने की तरह है, पहला कमरा... अंधकारमय, बिल्कुल अंधकारमय. इधर-उधर भटकना, उछलना और फिर धीरे-धीरे पता चलने लगता है की कहाँ कौन सा फर्नीचर है. और फिर अंततः ६ महीने या ऐसे ही कुछ समय पश्चात पता चलता है की स्विच किधर है, उसे दबा देना और फिर सबकुछ जगमगा उठता है... तब सब कुछ दिखने लगता है और ये पता चलता है कि मैं कहाँ हूँ ! -- एंड्र्यू वाइल्स बीबीसी की एक डॉक्युमेंट्री के प्रारम्भ में.

हर चार साल पर दिया जाने वाला फील्ड्स मेडल गणित के क्षेत्र का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है. तो फिर एंड्र्यू वाइल्स को निर्विवाद रूप से मिल जाना चाहिए. पर फील्ड्स मेडल में एक शर्त होती है की पुरस्कार मिलने वाले साल तक गणितज्ञ की आयु ४० से ज्यादा नहीं होनी चाहिए ! एंड्र्यू वाइल्स का जन्म १९५३ में हुआ था और उस हिसाब से १९९४ में वो एक साल ज्यादा के हो गए थे. नियम तो फिर नियम ही है तो उन्हें ये पुरस्कार नहीं दिया गया*. पर फील्ड्स मेडल की समिति ने उन्हें पुरस्कृत करना ही उचित समझा और १९९८ में उन्हें अलग से एक विशेष रजत-फलक दिया गया. फील्ड्स मेडल पर महान गणितज्ञ आर्कीमिडिस की तस्वीर होती है. ४० साल से कम क्यों? इसकी एक आम धारणा ये है की गणितज्ञ अपनी मौलिक सोच (Original ideas) ४० के पहले ही सोचते हैं इसके बाद वो गणित पर बस काम करते हैं खोज तो कम उम्र में ही होती है. इस चालीस साल की बात से याद आया जी एच हार्डी की ये बात जो उन्होंने अपनी पुस्तक 'A Mathematician's Apology' में लिखी है.**
"किसी भी गणितज्ञ को ये नहीं भूलना चाहिए की गणित युवा लोगों का खेल है. इसका सबसे आसान उदहारण यही है की रोयल सोसाइटी में गणितज्ञों की औसत उम्र सबसे कम है. और भी कई उदहारण लिए जा सकते हैं न्यूटन ने ५० की उम्र में गणित छोड़ दिया. वे मानते थे की ४० वर्ष की उम्र के साथ ही उनकी मौलिक रचनात्मकता के महानतम दिन ख़त्म हो गए...
...गैल्वास की मृत्यु २१ साल की उम्र में हो गई. रामानुजन ३३ में और रीमान ४० की उम्र में चल बसे. कुछ लोगों ने इस उम्र के बाद भी काम किया है जैसे की गॉस ने डिफेरेंसिअल जियोमेट्री तब लिखी जब वो ५० साल के थे, लेकिन इसका विचार उन्हें १० साल पहले ही आ गया था. मेरी नज़र में कोई बड़ी गणितीय खोज ४० की उम्र के बाद किसी ने नहीं की. और अगर किसी की इस उम्र के बाद गणित गणित में रूचि कम हो जाती है तो इससे न तो उसकी न गणित की ही कोई क्षति होने वाली है." --जी एच हार्डी


कई गणितज्ञों ने फ़र्मैट के अन्तिम प्रमेय पर काम किया ये तो हम देख ही चुके है पर अगर इस महिला गणितज्ञ की चर्चा न हो तो शायद श्रृंखला अधूरी रह जाय. पोस्ट लम्बी हो रही है इसलिए आगे नहीं लिखूंगा बस इतना बताता चलूँ की इस महान गणितज्ञ को महिला होने का खामियाजा भुगतना पड़ा. नहीं तो आज इतिहास में कहीं और ज्यादा नाम होता... फ़र्मैट के अन्तिम प्रमेय पर सही तरीके से सोचने वाले बहुत कम लोगों में वो एक थी. उस संघर्ष, दुःख और गणित से प्यार की कहानी अगले पोस्ट में.



चित्र: साभार, विकिपीडिया
*ऐसे पुरस्कारों के साथ ऐसी कहानियाँ तो होती ही है... शायद नोबेल पुरस्कार की सबसे बड़ी कमी हमेशा के लिए ये रह जाय की गांधीजी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला. गांधीजी ऐसे किसी पुरस्कार के मोहताज तो न थे... पर ये मलाल शायद नोबेल समिति को रहे. इस बारे में अगर रूचि हो तो नोबेल पुरस्कार की आधिकारिक वेबसाइट पर इस लिंक पर पढ़ आए.
**पुस्तक की सॉफ्ट कॉपी पास में होने का यह एक बहुत बड़ा फायदा है... जब जिस पैराग्राफ की जरुरत हो खोल के सर्च कर लो.

Friday, July 25, 2008

सात साल में बना १००० पन्नों का हल (बातें गणित की... भाग IX)

पिछले पोस्ट में हमने देखा की किस तरह अनसुलझे सवालों का पिटारा तैयार हो गया और सारे अनसुलझे सवाल एक-दुसरे से जुड़े हुए थे. इस बीच विशेषज्ञों ने सलाह दी की पानी सर के ऊपर से जा रहा है और बेहतर होगा की अब नंबर थियोरी से ऊपर उठकर सोचा जाय. और लोग नए जोश से इस सवाल को हल करने में लग गए. अब एक और गणितज्ञ का परिचय हो जाय. एंड्र्यू वाइल्स (Andrew Wiles) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से गणित पढ़कर प्रिन्सटन पहुच गए पढाने, अभी भी वहीँ पढाते हैं...

इस दौरान एक सवाल हल हो गया. बर्कली स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के केन रिबेट (Ken Ribet) ने जीन पिएरे के एप्सिलोन अनुभाग (Epsilon Conjecture) को साबित कर दिया. ये ख़बर सुनकर एंड्र्यू वाइल्स ने तानिमाया अनुभाग हल करने की ठान ली... क्योंकि अगर ये हो गया तो फिर फ़र्मैट का अन्तिम प्रमेय भी हो गया. और फिर सात सालों तक सारे शोध कार्य छोड़कर एकांत में... वो काम करते रहे... केवल एक सवाल पर... गणित के महानतम सवाल पर. कुछ रिसर्च पेपर से, पर ज्यादातर ख़ुद के दिमाग से... वो काम करते रहे. कहते हैं की २ साल तक वो सवाल में अपने आपको डुबाये रहे ताकि एक स्ट्रेटजी सोच सकें.

तानियामा के अनुसार इलिप्टिक कर्व और मोडुलर फोर्म्स दोनों सेट एक ही हैं... यानी हर एक सदस्य के लिए दुसरे में वैसा ही सदस्य मौजूद है... पर समस्या ये की दोनों सेट में अनंत सदस्य ! गिनें तो कैसे गिनें? उन्होंने सहायता ली गैल्वास (Galois) के सिद्धांतों की. (गैल्वास की मजेदार के साथ-साथ दुखद कहानी जल्दी ही किसी पोस्ट में). गैल्वास के सिद्धांत ने कमाल किया और अब समस्या रह गई गैल्वास के सिद्धांत से मोडुलर फॉर्म के तुलना की. तीन साल में इतना हो पाया और ये बात कोई नहीं जानता था सिवाय एंड्र्यू की पत्नी के! इसके बाद कई सारे शोध और कईयों की थियोरी का इस्तेमाल किया एंड्र्यू ने. वो ये बातें किसी को नहीं बताते दो कारण थे एक ये की वो अपना ध्यान नहीं भंग करना चाहते थे और दूसरा ये... कौन कहे की आज के जमाने में भी लोग फ़र्मैट के अन्तिम प्रमेय पर काम करते हैं :-) वो ये बातें पत्नी के अलावा केवल अपने मित्र निक कट्ज़ (Nick Katz) को बताते थे.

और फिर १९९३ में न्यूटन इंस्टीच्युट ऑफ़ मैथेमेटिकल साइंसेस, कैम्ब्रिज में अपने गाइड द्बारा आयोजित कांफ्रेंस में उन्होंने व्याख्यान दिया 'इलिप्टिक कर्व, मोडुलर फॉर्म और गैल्वास रेप्रेसेंटेशन' पर. व्याख्यान में कई नए विचार प्रस्तुत किए गए पर न तो व्याख्यान के शीर्षक में न ही व्याख्यान में फ़र्मैट की चर्चा थी. जब व्याख्यान देते-देते वो अंत तक पहुचे तो सुनाने वालों के चहरे गंभीर हो गए थे... सबको लग गया था की अब कुछ बड़ा होने वाला है और फिर उन्होंने लिख दिया 'फ़र्मैट के अन्तिम प्रमेय का कथन' और लिख दिया हेंस प्रूव्ड !

और अगले दिन हर अखबार में ये ख़बर आई की अंततः प्रमेय सिद्ध हो गया !

एक कमिटी बनी लंबे चौडे हल की जांच के लिए और फिर निकली एक गलती... [गणित के प्रूफ़ में गलती होना तो आम बात है... उनकी तो हो गई. हम तो जान बुझ के कर दिया करते थे... जब प्रूफ़ नहीं आ रहा हो तो एक तरफ़ से बढ़ते-बढ़ते कहीं तक गए, दूसरी तरफ से चले तो कहीं और. फिर बीच में एक लाइन ऐसी होती थी जहाँ दोनों को बराबर दिखा देते :-) पर आईआईटी के प्रोफेसर कभी नंबर नहीं दिए... उत्तर पुस्तिका में जब How? Why? और So What? How Come? जैसी टिपण्णी लिखी मिल जाती तो चुप-चाप उत्तर पुस्तिका को मोड़ के रख लेते :(] इधर फिर वापस एंड्र्यू को लगना पड़ा सवाल पर... पर इस बार मामला इतना आसान नहीं था, पहले वो बिना किसी को बताये इस सवाल पर शान्ति से काम करते पर अब सबकी नज़रें इस पर लगी हुई थी... (गनीमत है 'आज तक' जैसे चैनल न थे अमेरिका में तब, नहीं तो बेचारे कुछ ना कर पाते). ध्यान नहीं लग पा रहा था और पहली बार एंड्र्यू ने किसी की मदद ली और उन्होंने अपने पूर्व छात्र टेलर को बुला भेजा. एक साल तक कोई सफलता हाथ नहीं लगी... और फिर एक दिन, उन्हें समस्या दिख गई और उन्होंने उसे निपटा दिया. और फिर फ़र्मैट का अन्तिम प्रमेय पूरी तरह से हल हो गया.

पूरा हल १००० हजार पन्नो का हुआ... जो व्याख्यान 'न्यूटन इंस्टीच्युट ऑफ़ मैथेमेटिकल साइंसेस' में उन्होंने दिया था वही कुछ २०० पन्नो का था. तो फ़र्मैट ने अगर कहा था की किताब के हाशिये में कम जगह है तो क्या ग़लत कहा था ! पिछले पोस्ट की टिपण्णी में ज्ञानजी ने कहा की उनके उपनिदेशक ने इस सवाल को लेकर फील्ड्स मेडल के सपने दिखाए थे... तो क्या एंड्र्यू वाइल्स को फील्ड्स मैडल मिला? क्यों नहीं मिलेगा भाई, आख़िर उन्होंने गणित का महानतम सवाल हल किया था ! पर क्या और क्यों हुआ जानते हैं अगली पोस्ट में. (फील्ड्स मेडल गणित के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार के समान माना जाता है).

~Abhishek Ojha~