Saturday, July 12, 2008

आंकडों की समस्या और ब्लॉगजगत का गणित (बातें गणित की भाग... VI)

पिछले पोस्ट पर आई दो टिपण्णीयाँ:

अनूप शुक्ल: अच्छा गणितीय उपयोग है। निष्कर्ष के लिये गणित सहयोगी है लेकिन ये आंकड़े जुटाना अपने में कठिन काम है।
masijeevi: रोचक काम करते रहे हैं आप।
कुछ और ब्‍यौरे रहते तो और अच्‍छा होता- ब्लॉगवाणी जैसी झलकियॉं हो गईं इस बात से हम भी सहमत हैं।
कुछ और मॉडलों पर विचार करें- कैसे तय हो कि आज की सबसे अच्‍छी पोस्‍ट किसकी होगी... कौन सी पोस्‍टें पढी जाएंगी किन पर टिप्‍पणी मिलेंगी और ऐसी कितनी होंगी जिनपर टिप्‍पणी तो मिलेंगी लेकिन पढ़ी नहीं जाएंगी... मतलब ब्‍लॉगजगत का गणित :))


अनूप जी ने बिल्कुल सही बात कही है, हमें तो आंकड़े दे दिए गए थे, लेकिन अगर ऐसे निष्कर्षों तक पहुचने में कुछ सबसे ज्यादा दिक्कत काम है तो वो है आंकडा इकठ्ठा करना. अपने देश में और मुश्किल, अपने देश में मुश्किल इसलिए की चीज़ें थोडी अव्यवस्थित हैं... या यूँ कहें की एकाउंटएबिलिटी नहीं है हर चीज़ की.अब देखिये जैसे पिछली पोस्ट में बनिए की दूकान से डिटर्जेंट का आंकडा इकठ्ठा किया गया था कनाडा में. उसमे किस परिवार ने क्या खरीदा?, महीने के किस तारीख को खरीदा?, उस घर में कितने लोग है? कितनी आय है? इस प्रकार से खूब आंकड़े थे. इन्हें इकठ्ठा करना वहां आसान था, हर ग्राहक को एक स्मार्ट कार्ड बाँट दिया गया और फिर काम आसान हो गया. वैसे ही अगर किस राज्य में कितनी गाडियां बिकी... किसी एक साल में ये जानना हो तो अपने देश में हर आरटीओ जाकर हर वर्ग में रजिस्टर हुई गाड़ियों की संख्या पता करो या फिर हर तरह के गाड़ी निर्माताओं से संपर्क करो. ये जानकारी हासिल करना उन देशों में आसान हो जाता है जहाँ सबकुछ कम्प्यूटर की सहायता से होता है. ये भी एक कारण है की रिसर्च पेपर उन देशों के आंकडों से ज्यादा छपते है और अपने यहाँ पूरी तरह से प्रभावी नहीं होते. अभी तक सांख्यिकी पर कुछ लिखा ही नहीं गया इस श्रृंखला में. तो आंकडो की समस्या की चर्चा उस पोस्ट के लिए छोड़ देते हैं।


आंकडों की समस्या बात उठ ही गई है तो आपको बताता चलूँ की वित्त और इनवेस्टमेंट बैंकिंग का एक मिनट भी आंकडों के बिना काम नहीं चल सकता. माइकल ब्लूमबर्ग सोलोमन ब्रदर्स नामक इनवेस्टमेंट बैंक में काम करते थे १९६६ से १९८१ तक. १५ वर्षों के अनुभव के बाद उन्हें आंकडों की समस्या हल करने की सूझी और उन्होंने १९८१ में ब्लूमबर्ग नाम की कंपनी खोली जिसका मुख्य काम हर तरह के आंकड़े और सुचना देना था. आज शायद ही कोई वित्तीय कम्पनी हो जो ब्लूमबर्ग के उत्पादों का इस्तेमाल ना करती हो. माइकल ब्लूमबर्ग अब दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में से एक हैं फोर्ब्स के अनुसार उनकी संपत्ति ११.५ अरब अमेरिकी डालर के बराबर है.
अभी न्यूयार्क शहर के मेयर हैं और दानी होने तथा मात्र १ डालर वार्षिक आय लेने के कारण जाने जाते हैं. ९/११ की घटना के बाद अपनी कर्मठता के लिए भी जाने जाते है, अमेरिकी चुनाव में राष्ट्रपति पड़ के उमीद्वार होने की भी अटकलें लगाई गई. तो आंकड़े कमाल कर सकते हैं, आपको कहाँ से कहाँ पंहुचा सकते हैं ये तो आपने देख ही लिया. ब्लूमबर्ग तथा रॉयटर्स का एक तरह से वित्तीय आंकडों के बाजार में एकाधिकार है. (चित्र में: माइकल ब्लूमबर्ग और एक ब्लूमबर्ग टर्मिनल)
चित्र साभार: विकिपीडिया और http://blogs.pcworld.co.nz/pcworld/ck-live/bloomberg.jpg

अब बात ब्लॉग जगत के गणित की, मसीजीवीजी के सारे सवालों के उत्तर बहुत आसान है, बस कमी है तो आंकडों की. आप आंकड़े ले आइये हम जवाब देते हैं :-) वैसे आंकडें न भी मिलें तो थियोरी तो दी ही जा सकती है तो चलिए कुछ साधारण बातों की चर्चा कर लेते हैं. यह मानते हुए की आंकड़े उपलब्ध है. वैसे इस प्रकार का काम खूब होता है आजकल. जैसे मान लीजिये रेडिफ.कॉम खोला आपने. हर एक विजीट और क्लिक की अनाल्य्सिस की जाती है. इस बात की भी अनाल्य्सिस की जाती है कौन से ऐडवटाइज्मेन्ट ज्यादा क्लिक होते हैं? और कैसी हेडलाइनें ज्यादा पढ़ी जाती है. अब रेडिफ.कॉम की घर की खेती है... सारे आंकड़े होते हैं उनके पास हमें आंकडें मिलेंगे कहाँ से?

इन सब में डाटा माइनिंग,पैटर्न मैचिंग और सांख्यिकी का खूब इस्तेमाल होता है. मेरे कई दोस्त इस तरह के काम भी करते हैं.

अब मान लीजिये की सारा आंकडा उपलब्ध है तो उसमें ट्रेंड निकालना बड़ी बात नहीं होती. और उससे कई तरह की जानकारी निकाली जा सकती है. और फिर जरुरत के हिसाब से मॉडल में सुधार भी किया जा सकता है. कुछ प्राथमिक जानकारी तो ऐसे ही मिल जायेगी जैसे:
- कितने प्रतिशत पोस्ट ऐसे हैं जिन पर टिपण्णी है.
- हर पोस्ट पर औसत कितनी टिपण्णी आती है (इसके साथ ही माध्यिका(median) और बहुलक(mode) भी निकाला जा सकता है).
- औसत अंतराल जिन पर टिपण्णी आती है किसी ब्लॉग पर.
- टिपण्णी की लम्बाई (उसका औसत, मध्यिका, मानक विचलन(standard deviation) इत्यादि)

अब वितरण भी निकाला जा सकता है... मेरे हिसाब से अगर टिपण्णीयों की संख्या का वितरण (distribution) निकाला जाय तो कुछ इस तरह का आना चाहिए. यहाँ एक्स-अक्सिस पर टिपण्णीयों की संख्या तथा वाय-अक्सिस पर ब्लोगों की संख्या है. इसे लम्बी पुँछ का वितरण (Long tail distribution) भी कहा जाता है.बात साफ़ है ज्यादा टिपण्णी वाले ब्लोगों की संख्या कम है और कम या फिर बिना टिपण्णी वाले ब्लॉग की संख्या ज्यादा. अगर टिपण्णी की लम्बाई ले तो भी ऐसा ही वितरण आना चाहिए यानी किसी ब्लॉग पर लम्बी टिपण्णी वाले पोस्ट कम और छोटी टिपण्णी वाले पोस्ट ज्यादा होंगे. (यहाँ एक्स-अक्सिस पर टिपण्णी की लम्बाई और वाय-अक्सिस पर पोस्ट की संख्या).अगर एक बार वितरण का अनुमान हो गया तो फिर कई सूत्र हैं जानकारी निकालने के लिए. अब इसमें कुछ आउटलायर भी होंगे, जैसे मान लीजिये किसी ने टिपण्णी करना ही डिसेबल कर दिया हो. या फिर ऐसे जिन्हें खूब टिपण्णी मिलती हो. वैसे बिना आंकडों के भी ऐसे आउटलायरों को तो हम जानते ही हैं :-)

अब आगे बढ़ते हैं अगले सवालों की तरफ़ अगर हम ब्लॉग पर आने वालों की संख्या तथा टिपण्णी की संख्यां के बीच सहसंबंध (correlation) निकाल लें तो ये भी बड़े काम की जानकारी होगी, इससे ये पता चलेगा की किसी ब्लॉग पर आने वाले लोग टिपण्णी करते हैं या नहीं (हिट्स बढ़ा लेने की लिए ब्लॉग पर कीवर्ड या विवादित शब्द डाले जा सकते हैं, पर इससे टिपण्णी की संख्या नहीं बढाई जा सकती !) अब इसमे भी वितरण निकालने पर आउटलायर निकाले जा सकते हैं, वैसे जिनपर लोग आते तो हैं पर टिपण्णी नहीं करते (इसका कारण मोडरेशन भी हो सकता है). और ऐसे भी जिन पर लोग तो कम आते हैं पर उस हिसाब से टिपण्णी ज्यादा ऐसा हिन्दी ब्लोग्स में अक्सर देखने को मिलता हैं जहाँ लोग एक मित्र मंडली की तरह ब्लॉग पढ़ते हैं और जो भी आता है एक टिपण्णी चटका जाता है. तो लोकप्रियता का बेहतर मापदंड केवल टिपण्णी या केवल ब्लॉग विजीट न होकर उनके बीच का सहसंबंध भी हो सकता है. अब ऐसा भी होता है की किसी एक ब्लॉग में कुछ पोस्ट ओउलायर होते हैं... इनको अलग करके इनमे पैटर्न निकाला जा सकता है. पैटर्न निकालने में एक उदहारण देना चाहूँगा मान लीजिये की हम देखते हैं की किसी ब्लॉग पर आई कुल टिपण्णीयों में कितने 'साधुवाद', फिर 'सहमत हूँ आपसे', 'धन्यवाद इस पोस्ट के लिए', 'रोचक जानकारी' जैसे हैं. इनकी संख्या तथा अन्य टिपण्णीयों की लम्बाई पर मॉडल बनाए जा सकते हैं. इसके अलावा इस बात की भी जांच की जा सकती है की कितने बजे छपने वाले पोस्ट पर कितनी टिपण्णी आती है. (इसके लिए एक ही ब्लॉग के पोस्ट के छपने का समय और आई टिपण्णीयों का सम्बन्ध भी मिल सकता है) बहुत तरह का गणित लगाया जा सकता है, जरुरत है तो सिर्फ़ आंकडों की !
आगे जिस सवाल की चर्चा होनी है वो गणित के एक हलके सवाल से शुरू हुआ और गणित का सबसे कठिन सवाल बन गया, इतना आसन की छठी कक्षा के छात्र को समझ में आ जाय और इतना कठिन की ४०० सालों तक कोई गणितज्ञ ना हल कर पाया. इतिहास के सबसे बड़े-बड़े गणितज्ञों ने हाथ आजमाया... क्या हुआ जानते हैं जल्दी ही.. !


~Abhishek Ojha~

Thursday, July 10, 2008

गणित के कुछ वास्तविक प्रयोग (बातें गणित की भाग... V)

आज गणित के कुछ ऐसे प्रयोग जिनसे मैं ख़ुद जुडा हूँ, जी हाँ कुछ ऐसे प्रयोग जिनपर मैंने काम किया... अर्थशास्त्र, मार्केटिंग, मनोविज्ञान और इंजीनियरिंग जैसे कुछ क्षेत्रों से बातें होगी, फुटबॉल और क्रिकेट जैसे खेल आपको पसंद हैं तो उनका भी जिक्र भी आ जायेगा और अगर आपको लगता है की मैच देखना समय की बर्बादी है तो वो भी जोड़ लेंगे... कहीं आपको ऐसा तो नहीं लग रहा है की ये सब गणित में कहाँ से आ गया, अब वास्तविक प्रयोग है तो वास्तविकता ही ज्यादा होगी ना ! अगर आप इससे आगे नहीं पढ़ रहे तो आपको बताता चलूँ की जल्दी ही गणित के सबसे रोचक सवाल के इतिहास और उससे जुड़े रोचक तथ्यों पर अगली पोस्ट आने वाली है (अगर ये पोस्ट दो भागों में नहीं बटी तो) पर आगे पढने से डरने की जरुरत नहीं है... सब कुछ समझ में आने की गारंटी मेरी !

1. बात की शुरुआत राजनीति और उर्जा से... तेल की कीमतों और न्यूक्लियर डील से तो आप सब परिचित हैं ही, अब एक और विकल्प भी आप अखबारों में देखते ही होंगे ईरान-पकिस्तान पाइपलाइन की... ईरान से पाकिस्तान होते हुए भारत तक गैस लाने के लिए पाइपलाइन बनाने की. अब गणित लगाना था की कौन-कौन से विकल्प हैं भारत के पास... कौन सा विकल्प महंगा पड़ेगा और कितना... चलिए अब इस प्राकृतिक गैस के बारे में भी जान लेते हैं... दो मुख्य तरीके होते हैं इसे एक जगह से दुसरे जगह ले जाने के, पहला गैस पाइपलाइन और दूसरा टैंकरयुक्त पानी के जहाजों से. तो फिर पाकिस्तान को बीच में लाने की जरुरत ही क्या है? टैंकर से ही ले आते हैं... पर गणित कुछ और कहता है... जब हम खर्च की बात करते हैं तो पता चलता है की एक ख़ास दुरी तक से गैस लाने में पाइपलाइन की गैस बहुत सस्ती पड़ती है वहीँ उस दूरी से ज्यादा दूरी से गैस लानी हो तो टैकर सस्ते पड़ते हैं. खर्चे कई तरह के होते हैं, कुछ खर्चे दोनों तरीकों में होते हैं जैसे गैस को निकलना और उसे उपयोगी बनाना, जमीन या समुद्र से निकलने वाली गैस में कई सारे अवांछनीय पदार्थ भी होते हैं... कई बार इन अवांछनीय पदार्थों को जमीन के अन्दर वापस डालना पड़ता है... इसे वापस डालते समय भी इससे प्रेसर बनाया जाता है ताकि और गैस जमीन के अन्दर से आसानी से निकाली जा सके. टैंकर का इस्तेमाल करना हो तो गैस को पहले द्रव में परिवर्तित करना पड़ता है, उसके बाद टैंकरों का खर्च अलग, तो क्या पाइपलाइन एक बार बना दी तो गैस भेजते रहो? नहीं ऐसा नहीं है... पाइपलाइन में उपयुक्त प्रेशर बनाए रखने के लिए थोडी-थोडी दूर पर कम्प्रेसर लगाने पड़ते हैं, और उनका खर्च अलग से, उनके लिए उर्जा भी अलग से... दोनों ही तरीकों में मेंटेनेंस जैसे खर्च होते ही हैं. जैसे दूरी के हिसाब से टैंकर बेहतर हो जाता है वैसे ही कांट्रेक्ट की अवधि के हिसाब से भी होता है... अगर लम्बी अवधि का कांट्रेक्ट हो तो पाइपलाइन सस्ता पड़ता है और कम अवधि का हो तो द्रवित प्राकृतिक गैस के टैंकर सस्ते होते हैं. पाइपलाइन भी जमीन के अलावा समुद्र में भी हो सकती है... उसके लिए टेक्नोलॉजी और खर्च दोनों चाहिए. इस तरह इन सारी चीज़ों का ध्यान रखते हुए हमने मॉडल बनाया और फिर ग्राफ्स और अन्तिम कीमत निकलने के लिए सूत्र. पाइपलाइन वाला फार्मूला थोड़ा जटिल हो गया क्योंकि कम्प्रेसर के लिए मेकेनिकल इंजीनियरिंग की मदद लेनी पड़ी.

2. अब बात करते हैं प्रोसेस मोडेलिंग की... ये काम बहुत रोचक था इसमें साधारण ओपरेशन रिसर्च से लेकर मनोविज्ञान तक का इस्तेमाल होता है, इसमें ये देखना था की किसी प्रोजेक्ट को पुरा करने वास्तविक रूप में कितना समय लगेगा, इसके लिए प्रोजेक्ट का पूरा आंकडा होना चाहिए और हर काम को कौन आदमी करेगा और उसकी योग्यता क्या है ये सब होना चाहिए, इसमें बहुत सारी बातें ध्यान में रखी गई जैसे मान लीजिये फूटबाल या क्रिकेट का वर्ल्ड कप चालु हो गया तो फिर उसका क्या असर होगा? इस काम के विशेषज्ञ स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रेमंड लेविट के विडियो लेक्चर को खूब सुना... लेक्चर सुनता और विद्यार्थियों को पढाता भी :-) अपने से बड़ों को पढाना, कई बार अपने गाइड को भी पढाता :-) इससे अच्छा और क्या हो सकता है !

3. एक और रोचक प्रोजेक्ट के बारे में आपको बता दूँ... मान लीजिये की आप किसी भीड़-भाड़ वाले स्टेशन पर खड़े हैं और आग लग जाए तो आप क्या करेंगे? भागेंगे... किस दिशा में भागेंगे? निकास की तरफ़... आकस्मिक भय (पैनिक) की हालत में अगर सब भागने लगें तो क्या हो? स्टेशन तो ये सोच के बनाया नहीं गया था... अब मान लीजिये की इस हिसाब से स्टेशन के भवन में बदलाव लाना है, तो कैसे लाया जाय ताकि पूरा भवन गिराना न पड़े... इसके लिए गणित को याद किया गया और फिर कम्प्यूटर साइंस को... और बन गया ये प्रोडक्ट, इस काम करना भी खूब रोचक रहा और हमने ज्यूरिक रेलवे स्टेशन को ओप्टिमाइज किया.

4. आपने थ्री डाइमेन्सन तो सुना ही होगा पर कभी फ़ोर डाइमेन्सन सुना है? जी हाँ एक समय भी जोड़ दीजिये... फ़ोर डाइमेन्सन में किसी प्रोजेक्ट का ओप्टिमाइजेसन करने का काम जेनेटिक अल्गोरिथम से... छोडिये नाम से ही भारी हो रहा है... इस काम को करने में भी बहुत मज़ा आया.

5. अब चलिए थोड़ा एन्सुरेंस एजेंट और लोन वसूली को आराम दिया जाय, जी हाँ ये पता करना की कौन आदमी लोन और प्रीमियम सही टाइम पर देगा और कौन देर से करेगा... उस हिसाब से उसी एरिया में एजेंटों को भेजा जाय तो कितनी अच्छी बात होगी... और पैसे की बचत भी होगी, इस काम को करने के लिए कई मॉडल हैं पर ये समय के साथ बदलते नहीं ! मान लीजिये किसी की माली हालत बीच में ख़राब हो गई तो? इसलिए हमने हर कलेक्शन के बाद मॉडल में सुधार किया (यह बेसियन इकोनोमेट्रिक्स का एक प्रयोग था, पहले ऐसे कम्प्यूटर नहीं थे जो इतना बड़ा-बड़ा हिसाब कर सकें इसलिए पहले इस विधा का उपयोग नहीं हो पाता था), आप इसे डायनामिक मॉडल कह सकते हैं।

6. थोड़ा तेल-साबुन बेचने का भी प्रयास किया, कनाडा के एक मुहल्ले से आंकडा लाया गया और अब पता ये करना था की किस तरह की आय वाली जगह पर कैसा डिटर्जेंट बेचा जाय और कौन सा केचप... सीधी सी बात है समाज का जो वर्ग निरमा खरीदता है वो सर्फ़ एक्सेल नहीं... (इसे मार्केट सेगमेंटेशन भी कहा जाता है, इस पर भी जो स्थायी मॉडल हैं उन पर कुछ सुधार का काम किया).

7. अब सब बेच लिया तो कुछ खरीदने की बात भी हो जाय... तो भारत में गाड़ियों की विक्री किस तरह बढ़ी है, कितना बढेगी... इस पर भी कुछ दिन काम किया...

8. और अंत में मेरी थीसिस... जो थोडी ज्यादा गणितीय है इसीलिए इतना बता दूँ की यह नेटवर्क फ्लो पर आधारित था... नेटवर्क किसी भी चीज़ का हो सकता है... मान लीजिये रेल या सड़क का पूरा एक नेटवर्क है... एक से दूसरी जगह समान भेजना है... इसको कैसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह भेजना है ताकि खर्च और समय बचे... ज्यादा से ज्यादा सामान भेजा जा सके, इस काम के लिए कई अल्गोरिथम है... पर हमारा काम इस बात का था की अगर कम्प्यूटर इस सवाल के लिए एक घंटे लेता है तो कैसे इसे कम समय में किया जाय... हमने नया अल्गोरिथम तो नहीं दिया. हाँ ऐसे अल्गोरिथम अनुमान के साथ चालु किए जाते हैं और सही उत्तर की जगह जाकर जाते हैं, हमारे काम से ऐसे अनुमान लगाए जा सकते हैं जो कई बार ९०% तक कम समय में सवाल हल कर देते हैं. ये वैसे ही है जैसे मान लीजिये धुंध में आपको दिखाई नहीं दे रहा है और आपको पहाड़ की ऊंचाई पर चढ़ना है... आप अपने हिसाब से एक ऊँचे जगह पर पहुच कर यात्रा प्रारम्भ करेंगे और जो सबसे ऊँचा दिखाई देगा वहां तक पहुचते जायंगे... इस प्रकार कुछ देर के बाद आप अपने आपको सबसे ऊँची जगह पर पायेंगे... अब आप पहले से ही ऊंचाई पर हैं तो उसी समय पता लग जायेगा की इससे ऊपर कुछ नहीं है... हम भी ऐसे ही ऊँची जगह का काफ़ी हद तक (८०% स्थितियों में) पता लगाने में सफल रहे. चलिए बहुत हो गया... अगले पोस्ट में जैसा की मैंने कहा सबसे रोचक सवाल पर चर्चा होगी... उस पर बनी एक डॉक्युमेंट्री भी बहुत प्रसिद्द हुई... और भी छोटे-मोटे प्रोजेक्ट हैं, पर पोस्ट वैसे ही लम्बी होती जा रही है... इसलिए बस इतना ही !

अलग अलग प्रोजेक्ट इन जगहों पर किए गए..
1. IIM Bangalore, December 2004
2. i4Ds, Switzerland, May-July 2006
3. i4Ds, Switzerland, May-July 2005 (Known as aec-ii at that time)
4. i4Ds, Switzerland, May-July 2006
5. IIM Bangalore, December 2005
6. IIM Bangalore, December 2005
7. IIT Kanpur, May-July 2004
8. IIT Kanpur, Aug 2006-May 2007


अगर गलती से किसी के बारे में और जानने की इच्छा हो तो जरूर पूछें.



इसे एक ओवरव्यू की तरह ही लिया जाय... इस सप्ताह मुंबई जाना पड़ा और भी कई सारे काम आ गए, इस श्रृंखला को जारी रखने के लिए ये पोस्ट लिख डाली. इन विषयों पर विस्तृत चर्चा अलग-अलग पोस्ट में की जायेगी. (यह फैसला द्विवेदीजी और मसिजीवी जी की टिपण्णी को ध्यान में रखते हुए लिखा गया है)


~Abhishek Ojha~

Tuesday, July 1, 2008

गणित ने बचाई जान (बातें गणित की भाग... IV)

आज बात ऐसी... जिसमें गणित ने एक व्यक्ति की जान बचाई। वो भी किसी साधारण नहीं, ऐसे व्यक्ति की जिसे आगे चलकर नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया. जी हाँ आप को गणित से डर लगता है वो तो ठीक है पर आज ये प्रसंग सुन लीजिये, इसके बाद शायद आप गणित की महत्ता तो मानेंगे ही.

बात है रुसी क्रांति के समय की... सोवियत रूस के गणितीय भौतिकी (Mathematical Physics) के विद्वान इगोर टैम (Igor Tamm) को दक्षिणी उक्रेन के ओडेसा के समीप एक गाँव में साम्यवाद विरोधी (Anti-Communist) गिरोह ने धर दबोचा. उन्हें उक्रेन विरोधी साम्यवादी समझकर वो उन्हें अपने सरगना के पास ले गए...

सरदार ने पूछा: 'जीविका चलाने के लिए क्या करते हो?'
'जी, गणितज्ञ हूँ... !' [ बेचारे ठहरे गणित पढने-पढाने वाले... धर्मेन्द्र तो थे नहीं कि सरदार का खून ही पी जाते :)]
'हम्म...' [अगर गब्बर होता तो: साम्भा की तरफ़ देखकर सोचता... साम्भा की जगह इसी को रख लेते हैं हमारा काम करेगा, साम्भा आजकल बहुत घपला करता है आदमी और गोली गिनने में :-)]

पर कमाल की बात ये थी की ये सरदार पढ़ा-लिखा था और वो भी गणित जानता था.
सरदार बोला: 'ठीक है... किसी फलन (function) के टेलर श्रेणी (Taylor Series) के n स्थानों तक अनुमान लगाने में जो त्रुटी होगी, वो बता दो तो तुम्हे छोड़ दिया जायेगा नहीं तो तुम्हे गोली मार दी जायेगी'.

टैम साहब ने कांपती उंगुलियों से जमीन की धुल में त्रुटी निकाली, सरदार ने उत्तर देखा और कहा की इसे जाने दो.
[मोगैम्बो खुश हुआ !, और सरदार का वादा था तो मुकर जाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता]

सन १९५८ में टैम साहब को नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया... उन्हें जीवन भर उस दस्यु-सरगना का पता तो नहीं चल पाया... पर छात्रो को गणित की उपयोगिता बताने के लिए ये कहानी जरूर अमर हो गई.

चित्र साभार: नोबेल पुरस्कार वेबसाईट


ये कहानी मेरे मित्र और ऑफिस में सहकर्मी अजित बुरड ने मेरी गणित वाली श्रृंखला पढने के बाद भेजी, मैंने अनुवाद करके पोस्ट ठेल दिया. इसके अलावा गणित की शुद्धता वाली पोस्ट पर ये चुटकुला भी उन्होंने भेजा है और अपने ब्लॉग पर भी डाला है. आप भी देखिये.


अजित कम्प्यूटर साइंटिस्ट हैं, और ज्यादातर टेक्नीकल चीज़ों पर लिखते हैं उनकी वेबसाइट और अंग्रेजी में ब्लॉग आप यहाँ देख सकते हैं गणित में भी अच्छी रूचि रखते हैं. हाँ एक और बात अगर आप कोटा या जयपुर से हैं तो आज से ठीक ५ साल पहले यानी २००३ में आपने उनकी तस्वीर अखबार में देखी होंगी... कारण IIT की संयुक्त प्रवेश परीक्षा २००३ में टॉप १० में से एक थे, आशा है इस जानकारी के लिए वो नाराज नहीं होंगे ... बिना उनकी इजाजत के ही लिख रहा हूँ, अगर उनको आपत्ति होगी तो हटा दी जायेगी तब तक आपने पढ़ लिया तो ठीक :-)



इस बीच दिनेशराय द्विवेदीजी की एक हौसला बढाती हुई e-चिट्ठी मिली, बहुत आभार उनका. मसिजीवीजी ने भी ये पोस्ट ठेल डाली उनका भी आभार. इस सप्ताह अनुप्रयुक्त गणित के कुछ उदहारण लिखने वाला था अपने किए कुछ अलग-अलग कामों में से... वो अगले पोस्ट में. समयाभाव के इस सप्ताह के लिए बस इतना ही.

अगर गलती से टेलर श्रेणी में त्रुटी अनुमान जानने की इच्छा हो तो यहाँ देख लें. :-)

~Abhishek Ojha~