Friday, August 22, 2014

संस्कृत छंदों और संगीत के गणित से फील्ड्स मेडल तक



संस्कृत के छंदो, तबला और अंको से खेलने वाले विलक्षण गणितज्ञ मंजुल भार्गव को इस वर्ष गणित के सर्वोच्च पुरस्कार फील्ड्स मेडल से सम्मानित किया गया. फील्ड्स मेडल कमिटी ने कहा - "अद्भुत रूप से रचनात्मक गणितज्ञ मंजुल भार्गव के कार्य ने संख्या सिद्धान्त पर गहरा प्रभाव छोडा हैं।  गणित के कालातीत खूबसूरत सवालों में गहरी रुचि रखने वाले भार्गव ने ऐसे सवालो को हल करते हुए गहरी समझ प्रदान करने वाले सहज और सशक्त तरीकों की खोज की है."


पहले बात अंक सिद्धांत (नंबर थियरी) और कालातीत खूबसूरत सवालों की - गणित में अंक-सिद्धांत पूर्ण अंको का अध्ययन है जैसे  १,२, ३, -२०, ५०००, ०, ५० इत्यादि. पूर्णांकों के गुण, उनका वर्गीकरण (सम, विषम, रूढ़ संख्यायें इत्यादि. ) तथा उनके आपसी रिश्तों का अध्ययन. उस ज्यामिति का अध्ययन जिसके कोने पूर्णांकों से बने हो. पूर्ण अंको में क्रम-रूप-पैटर्न ढुंढना. ऐसे समीकरणो का अध्ययन जिनके हल पूर्ण अंक होते हैं. इत्यादि। पूर्णांकों का अध्ययन करते हुए कई नए सवाल और जवाब निकलते जाने से बनने वाला गणित.  गणित का वो रूप जो मानव ने सबसे पहले सीखा और हम आज भी बचपन में सबसे पहले गिनती सीखते हैं. आज ये अपने आपमें गणित की एक पूर्ण शाखा है - इतनी महत्त्वपूर्ण की इसे गणित की रानी भी कहते हैं. कालातीत खूबसूरत सवाल यूँ होते है कि जो किसी कम पढ़े लिखे व्यक्ति को भी आसानी से समझाए जा सकते हैं. पर उन्हें हल करना महारथी गणितज्ञों के बस का भी नहीं होता ! उनको हल करते हुए खूबसूरत गणित की परतें खुलती जाती हैं. जैसे गणित का सबसे प्रसिद्ध और एक लम्बे समय तक कठिनतम समझा जाने वाला सेलेब्रिटी सवाल - फ़र्मैट का आखिरी प्रमेय.


मंजुल भार्गव पिंगल-हेमचन्द्र-ब्रह्मगुप्त-नारायण पंडित-फ़र्मैट-गॉस-रामानुजन-एंड्रू वाइल्स घराने के गणितज्ञ हैं ! वैसे ये घराना मैंने अभी-अभी बनाया है. दरअसल ये वो महान गणितज्ञ हैं जिनकी विरासत को मंजुल भार्गव ने आगे बढ़ाया है. उनके काम और उनकी असाधारण उपलब्धियां उनको इन महान गणितज्ञों की श्रेणी में ला खड़ा करते हैं. गणित के अलावा भी मंजुल भार्गव का व्यक्तित्व बहुत रोचक  है. कनाडा में जन्म, अमेरिका में पले-बढे, जयपुर में अपने दादाजी के सानिद्ध्य में संस्कृत-संगीत और प्राचीन भारतीय गणित का अध्ययन, माँ से अनौपचारिक रुप से औपचारिक गणित की शिक्षा।  नियमित पढाई छोड़ कर बीच बीच में या तो वो अपनी माँ की गणित की कक्षा (जो गणित की एक प्रोफ़ेसर हैं) में जाकर बैठते या भारत में अपने दादाजी के साथ (संस्कृत के प्रोफ़ेसर) संस्कृत और संगीत (तबला) सीख रहे होते. बाद में उन्होंने विख्यात ज़ाकिर हुसैन से भी संगीत की शिक्षा ली.


प्राचीन भारत में गणित की समृद्ध परम्परा रही है. मंजुल भार्गव ने गणित उसी परंपरा से सीखन शुरू किया. संस्कृत के छंदों में भी गणित का इस्तेमाल होता है. पिंगल ने सर्वप्रथम छंदशास्त्र में (लगभग ४०० ई पू, कई इतिहासकारो के अनुसार पिंगल प्रसिद्ध व्याकरणाचार्य महर्षि पाणिनि के भाई थे) गुरु (s) और लघु (।) वर्णो का जिक्र किया। उन्होंने किसी भी छंद को द्विघाती (बाइनरी) में लिखने के साथ वर्णो की संख्या और क्रम का भी वर्णन किया. संभवतः ‘कॉम्बिनेटोरिक्स’ और ‘बाइनरी’ का विश्व में कहीं भी पहला लिखित रूप यही है. लघु को एक तथा गुरु को दो वर्ण माने तो एक निश्चित वर्ण समूह से कितने छंद संभव है? इस सवाल के हल ने ही विख्यात फिबोनाची क्रम को जन्म दिया ! पिंगल के मेरु प्रस्तर (आज का पास्कल ट्रेंगल) और  मात्रा-मेरु में फिबोनाची के प्रारंभिक विचार थे. फिबोनाची क्रम का वर्णन विरहांक (६००-८०० ई), गोपाल (११३५ ई के पहले) तथा हेमचन्द्र (११५० के पहले) ने किया। जैन विद्वान हेमचन्द्र, जिन्हे कलिकाल सर्वज्ञ भी कहते हैं, ने गोपाल की व्याख्या को समृद्ध कर आज के फिबोनाची क्रम का स्पष्ट वर्णन किया। कालांतर में नारायण पंडित (१३५६ ई) ने गणित कौमुदी में सामासिक-पंक्ति का जिक्र किया। फिबोनाची क्रम सामासिक पंक्ति का एक विशेष रूप भर है. फिबोनाची ने इस क्रम का जिक्र १२०२ ई में किया. फिबोनाची क्रम को कई गणितज्ञ गोपाल-हेमचन्द्र नम्बर्स के नाम से जानते हैं. मंजुल भार्गव के मुंह से फिबोनाची क्रम की जगह हेमचन्द्र नम्बर्स सुनना सुखद लगा. फिबोनाची क्रम और सौंदर्य अनुपात संभवतः प्रकृति में पाये जाने वाले गणित की खूबसूरती के सबसे बड़े उदाहरण हैं. गणित से मंजुल भार्गव का पहला परिचय इन संस्कृत छन्दो और शास्त्रीय संगीत (तबला) के धुनों से ही हुआ.


हावर्ड में स्नातक की पढाई करते हुए भार्गव ने गॉस की किताब Disquisitiones Arithmeticae पढ़ा, महानतम गणितज्ञ गॉस ने ये किताब 21 साल के उम्र में लिख डाला था। ये पुस्तक संख्या सिद्धान्त के गीता की तरह है। जैसे हर कोई कह देता है “गीता में लिखा है” वैसे ही हर अंक शास्त्री के लिए ये किताब है… पर गीता की ही तरह बहुत कम ने इसे अक्षरशः पढ़ा होता है। इस किताब में गॉस ने अनगिनत सिद्धांतों के अलावा अंको के एक ख़ास रूप 'बाइनरि क्वाड्रेटिक फॉर्म्स' की चर्चा की थी। वो अंक जो एक खास नियम का पालन करते हैं।  फिर उन्होने इन ख़ास अंको को मिलाकर इसी परिवार के  नए अंक बनाने का एक संयोजन नियम भी दिया।  ये संयोजन नियम एक तरह से बीजगणितीय संख्या सिद्धान्त के मुख्य उपकरण की तरह हैं। पर गॉस ने 20 पन्नों में इसे बड़ी कठिन गणितीय भाषा में समझाया था। मंजुल भार्गव ने इन अंको और नियमों को समझने का एक बिलकुल नया क्रांतिकारी तरीका दिया। अंको को रुबिक क्यूब के कोनो से सम्बंधित कर उन्होंने एक नया तरीका ईजाद किया। साथ ही अपने इस नए तरीके से उन्होने कई नए संयोजन नियम भी बनाए और द्विघाती (क्वाड्रेटिक) की जगह कई उच्चतर पदीय अंको के लिए नियम भी दिए. उन्होंने कुल 13 नए संयोजन नियमो की खोज की। गॉस के १८०१ में लिखे संयोजन नियम के बाद दो सौ वर्षों तक इससे पहले किसी ने नहीं सोचा था कि उच्चतर पदीय रूप वाले अंको के लिए ऐसे नियम हो भी सकते हैं! अंक सिद्धांत के लिए मंजुल भार्गव के इस नए तरीके और शोध ने जैसे एक नए क्षेत्र को ही जन्म दे दिया.


मंजुल भार्गव ने हाइपर एलिप्टिक कर्व पर भी काम किया है। आसान भाषा में समझना चाहें तो ये ज्यामितीय अध्ययन है इस बात का कि.... किसी गणितीय संगणना से एक वर्ग संख्या आएगी या नहीं !  ऐसे कर्व्स के एक खास वर्ग को एलिप्टिक कर्व्स कहते हैं जिनका इस्तेमाल अब तक के सबसे प्रसिद्ध गणितीय सवाल फ़र्मैट के लास्ट थिओरम को हल करने में भी हुआ था। ये भी एक सुखद संयोग है कि उस ऐतिहासिक सवाल को हल करने वाले प्रिंस्टन विश्विद्यालय के ही एंड्रू वाइल्स के दिशा निर्देशन में मंजुल भार्गव ने पीएचडी की. संसार के सर्वश्रेष्ठ अंक सिद्धांत के विशेषज्ञ संभवतः अभी प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में ही हैं. एक प्रसिद्द और अत्यंत कठिन सवाल है कि एलिप्टिक कर्व्स कितने वास्तविक (रेशनल) अंको से होकर गुजरते हैं. एक, दो, तीन,.... अनंत या एक भी नहीं ! मंजुल भार्गव ने फिर एक बार कर्व्स और उनके वास्तविक बिन्दुओं में सम्बन्ध के नए तरीको से ये समझना आसान किया कि ऐसे कर्व पर कितने रेशनल पॉइंट होंगे।


एक और प्रसिद्ध सवाल जो महान गणितज्ञ फ़र्मैट के जमाने से ही चला आ रहा था वो ये कि क्या कोई ऐसा द्विघाती रूप  हो सकता है जिस रूप में सारी संख्याएँ लिखी जा सके? जैसे क^२ + ख^२ अर्थात दो संखाओं के वर्ग के योग का रूप ऐसा रूप नहीं है जिसमें सारे अंक लिखे जा सके। लैंगरेंज ने पहली बार बताया कि हर अंक को चार संख्याओं के वर्ग के योग के रूप में लिखा जा सकता है (क^२+ख^२+ग^२+घ^२). इसके लगभग सौ वर्षों बाद रामानुजन ने चार अंको के इस्तेमाल से ऐसे ५४ रूप दे दिये जिनमें सारी संख्याओं को लिखा जा सकता है. फिर ये सवाल आया कि ऐसे कितने रूप (फॉर्म्स) हो सकते हैं? १९९० के दशक में सवाल बदल कर ये हो गया कि क्या ऐसा कोई अंक है जिससे छोटी हर संख्या को अगर एक दिए गए रूप में लिखा जा सका तो फिर उस रूप में हर संख्या को ही लिखा जाना संभव है. फिर कुछ गणितज्ञों के प्रयास से ये अनुमान (कंजेक्चर) लगा कि शायद ये संख्या २९० है. मंजुल भार्गव ने अंततः ये साबित किया कि .... २९० और उससे छोटी २८ ऐसी संख्याएँ है कि अगर किसी द्विघाती रूप में इन २९ अंको को लिखा जा सकता है तो वो अंको का वैश्विक रूप हुआ अर्थात उस रूप में हर संख्या लिखी जा सकती है।


संक्षेप में कहना हो तो - मंजुल भार्गव ने बीजगणितीय अंक सिद्धांत की दुनिया के उन चीजों को गिनने के तरीके दिए हैं जो इससे पहले अगम्य थे ! और इन तरीकों ने गणितज्ञों के लिए नयी दुनिया के दरवाजे खोले जहाँ अब कई गणितज्ञ भ्रमण कर नित नयी चीजें ढूंढ पा रहे हैं.


भार्गव एक शुद्ध गणितज्ञ हैं. इस घराने के गणितज्ञ गणित सिर्फ उसकी  खूबसूरती और अपनी समझ, अपने सुकून के लिए पढ़ते हैं उन्हें गणित का कहीं इस्तेमाल नहीं करना होता। बल्कि जब उनके गणित का कहीं इस्तेमाल होने लगता है तो उन्हें आश्चर्य ही होता है. पर अक्सर ऐसा गणित उपयोग और विज्ञान की तरफ अपना रास्ता ढूंढ ही लेता है. जैसे रूढ़ संख्याओं का भला क्या उपयोग हो सकता है ?  एक साधारण उदाहरण लेते हैं.... किसी अंक का गुणनखण्ड हम सबने निकाला होगा। दो संख्याओं का गुणनफल निकालना हो तो वो बहुत आसान  होता है पर गुणनखण्ड निकलना उससे थोड़ा कठिन. ठीक यही कम्प्यूटर के लिए भी होता है. कितनी भी बड़ी रूढ़ संख्याएं हो उनका गुणनफल कम्यूटर कुछ पलों में आसानी से निकाल सकता है. पर अगर इसी सवाल का उल्टा करने को कहा जाय और अगर बहुत बड़ी संख्या हो तो कम्प्यूटर भी अरबों खरबों साल लगा दे ! गणितज्ञों को ऐसे सवालों का हल ढूंढने में आनंद आता है. पर खूबसूरती ये है कि सिर्फ आनंद और खूबसूरती के लिए हल किये जाने वाले ऐसे सवालों का इस्तेमाल हर जगह होने लगता है.… जैसे ऐसे सवालों का इस्तेमाल क्रेडिट कार्ड से किये जाने वाले भुगतान में होता है. सुचना सुरक्षित करने में (एन्क्रिप्शन)… आपके क्रेडिट कार्ड की सूचना से भुगतान बहुत आसान पर भुगतान की सुचना से क्रेडिट कार्ड की जानकारी निकलना लगभग असंभव !


मंजुल भार्गव रामानुजन की तरह उन विलक्षण गणितज्ञो की श्रेणी में आते हैं जिनके पास अद्भुत अंतर्दृष्टि (इंट्यूशन) होती है. जो गणित को एक उच्चतर स्तर पर लेकर जाते हैं. जिनके लिए गणित सत्य और खूबसूरती की खोज है. गणित के कठिनतम सवालों को देखने का जिनके पास एक जादुई नजरिया होता है. उनके लिए गणित के किसी कठिन अबूझ से सवाल को हल करने का अर्थ होता है सवाल को बिलकुल ही एक नए नजरिये से देखना। इस नजर से देखा भी जा सकता है पहले किसी ने सोचा भी नही होता. पर सुनने के बाद लगे यही तो असली तरीका है सोचने का - विशिष्ट पर सरल ! मंजुल भार्गव की सोच इतने अद्वितीय रूप से विशिष्ट होती है कि कोई भी गणितज्ञ पढ़ते हुए बता दे कि ऐसा मंजुल भार्गव ही सोच सकते हैं ! जैसे एक कलाकार की कला पहचान होती है, एक कवि की कविता और एक संगीतज्ञ का संगीत।


मंजुल भार्गव गणित को विज्ञान से अधिक कला मानते हैं. उनके अनुसार वो गणित में उन्हीं कारणों से  खोये रहते हैं जिन कारणों से संगीत और कविता में. उनके लिए अंक जैसे एक पंक्ति में खड़े हो जाते दीखते हों, अंतरिक्ष में, वायुमंडल में, रुबिक क्यूब के कोनों पर, संस्कृत अक्षरों में (वो संस्कृत के व्यंजनों  को उच्चारण के आधार पर बना 5x5 का मैट्रिक्स देखते हैं), कविताओं में, तबले की धुन में, कला में... फिर उनसे निकले विचार आलोकित करने वाले होते है ! उनके लिए गणित मानवता और ब्रह्माण्ड के सत्य को अभिव्यक्त करने का तरीका है. वो प्रिंसटन विश्वविद्यालय में संगीत का गणित, संस्कृत छंदों का गणित और जादुई कलाकारियों के गणित का एक कोर्स पढ़ाते हैं जिसमें वो तबला भी बजाते हैं. अगर इस तरीके से गणित पढ़ाया जाने लगे तो भला किसे गणित में आनंद नहीं आएगा। वो कहते हैं - “जब मैं संस्कृत की कविताएँ पढ़ रहा था तब मुझे नहीं पता था कि मैं उनमें मुख्य धारा का गणित भी पढ़ रहा हूँ। बाद में गणित पढ़ते हुए उन्हें फिर से एक नए नाम और नए तरीके से पढ़ना मुझे आह्लादित करता। ऐसी चीजों में मुझे आनंद आता है जब विभिन्न विषयों की अनपेक्षित एकात्मकता देखने को मिलती है!”.


मंजुल भार्गव एक अद्भुत, समृद्ध और विलक्षण परंपरा के वाहक हैं... कामना है आने वाले समय में मंजुल भार्गव ऐसे ही गणित के अद्भुत सिद्धांत देते रहे !

~Abhishek Ojha~
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इस ब्लॉग पर कई पोस्ट हैं जो इस पोस्ट की बातों से जुडी हुई हैं  - पुरानी पोस्टें ज्यादा जुडी हुई है :)
गणित की खूबसूरती - http://baatein.aojha.in/search/label/Beauty%20in%20Mathematics
सौंदर्य अनुपात: http://baatein.aojha.in/search/label/Golden%20Ratio
फ़र्मैट का आखिरी प्रमेय: http://baatein.aojha.in/search/label/Fermat%27s%20Last%20Theorem

Friday, March 29, 2013

अपूर्णमिदं !

पूजा की पोस्ट पढ़ते हुए ये लाइन मिली - I am jigsaw puzzle of collective memories, the key piece of which has been lost with mummy, forever. For all they try, no one can assemble me with all the pieces in their right place. And so I remain, a confused jumble of faces, tears, smiles, people, lost and found, roads, rain, school, college, teachers, friends...

मुझे ये पढ़ते हुए इन्कम्प्लीटनेस थियोरम की याद आई और मेरे उस 'लभ लेटर' की ये लाइन -

"फिलहाल इंकम्पलिटनेस थियोरम की तरह जिंदगी है। उस जिगसा पज़ल की तरह जिसका एक टुकड़ा खो गया है। कैसे भी सुलझाऊँ बिन उस टुकड़े के अधूरा ही रहेगा। तुम्हें पता है वो टुकड़ा क्या है? - तुम हो वो टुकड़ा !"

टिप्पणी-प्रतिटिप्पणी के बीच पूजा ने कहा -incompleteness theorem की सविस्तार व्याख्या करें, उदहारण के साथ :O

तो हम वो समझाने जा रहे हैं जो लोग सही से ज्यादा गलत समझ लेते हैं। जैसा किसी भी 'अच्छे' सिद्धांत के साथ होता है। अक्सर लोग अपने हिसाब से इन्कम्प्लीटनेस थियोरम का मतलब निकाल लेते हैं- लिखते लिखते हम भी निकाल ही लेंगे ! तो बिन पढ़े मेरी समझ को कहीं भी अपने रिक्स पर इस्तेमाल करें। हाँ रिक्स ही कहा रिस्क नहीं :)

हर औपचारिक गणितीय प्रणाली एक सोच का नतीजा होती है। विशुद्ध सोच-तर्क और कुछ नहीं ! पूरी प्रणाली कुछ स्वयंसिद्ध मान लिए गए सिद्धांतों (Axiom) पर आधारित होती है। इन स्वयंसिद्ध कथनो पर कोई सवाल नहीं उठाता, उन्हें सच मान लेते हैं बिन कुछ पूछे - स्वयंसिद्ध - अंतर्ज्ञान, आत्मा की आवाज की तरह। जैसे "किसी भी दो बिंदु को मिलकर एक रेखा बनायीं जा सकती है"। ये स्वयंसिद्ध है। हर गणितीय प्रणाली ऐसे स्वयंसिद्ध नियमों और तर्क से मिलकर ही बनती है। इनके अलावा बाहर का कुछ भी इस प्रणाली में नहीं आ सकता। इनके अलावा जो भी हो उसे सिद्ध करना पड़ता है। इनके अलावा बिना सिद्ध किये कुछ भी मान्य नहीं होता।

गणित की भाषा में प्रणाली के पूर्ण (complete) का मतलब - किसी भी कथन को सही या गलत साबित करने की क्षमता। और संगत (consistent) का मतलब - कोई भी कथन ऐसा न हो जो सही और गलत दोनों सिद्ध हो जाए !

अब कायदे से हर गणितीय प्रणाली को पूर्ण होना चाहिए। अर्थात केवल वही कथन जो सत्य है उन्हें ही साबित होना चाहिए। कोई विरोधाभास नहीं होना चाहिए। और हर कथन को सही या गलत साबित करने की क्षमता भी होनी चाहिए। पर गोडेल ने अपूर्णता प्रमेय में कहा कि .... ऐसी प्रणाली की सीमाएं हैं ! उनका पहला प्रमेय ये कहता है (मोटे तौर पर) - अंकगणित के लिए किसी भी औपचारिक गणितीय प्रणाली, जो विराधोभासो से परे हो, में ऐसे कथन होंगे जिन्हें उस प्रणाली के अंतर्गत ना तो सत्य सिद्ध किया जा सकता है ना असत्य ! अर्थात अपूर्ण। गोडेल ने कहा कि हम किसी भी प्रणाली में नए स्वयंसिद्ध जोड़कर ऐसे कथनों को सत्य या असत्य की श्रेणी में रख सकते हैं। अर्थात जो सही या गलत न पता चले वैसे कथनो को दोनों में से एक मान लें तो गणितीय प्रणाली तो पूर्ण हो जाएगी -  पर ऐसा करने से फिर कुछ नए कथन बन जायेंगे जो फिर से ना सत्य ही रहेंगे ना असत्य। अर्थात अपूर्णता से निजात नहीं !

एक तरह से गोडेल ने कहा कि एक साथ सत्य और सर्वव्यापी प्रणाली नहीं हो सकती। बिन कुछ झूठ कहे हम हर सत्य को नहीं कह सकते या हमेशा कुछ ऐसा सत्य बचा रह जाएगा जिसे हम साबित नहीं कर सकते - हर कथन को साबित करना संभव नहीं ! कुछ न कुछ बचा रह जाना है। जिगसा पज़ल के एक मिसिंग टुकड़े की तरह। हम जैसे भी मिलाते जाएँ… एक टुकड़े के बिन पूर्ण आकृति नहीं बन सकती। दूसरा प्रमेय कहता है कि प्रणाली खुद अपनी असंगति सिद्ध नहीं कर सकती। पर हम बात पहले की ही करते हैं।

नियम और स्वयंसिद्धों से हमेशा कुछ कथन असिद्ध/अज्ञात (सत्य हैं या असत्य) रह जायेंगे। और अगर प्रणाली के बाहर से नए नियम और स्वयंसिद्ध कथन ले आयें तो? तो भी नए असिद्ध कथन बनते जायेंगे। कहने का मतलब अपूर्णता रहनी ही है। अर्थात हर प्रणाली में हम जितना भी जान पाते हैं उससे कहीं ज्यादा सत्य कथन होते ही हैं।

इस प्रमेय से जैसे ये कहा जाता है कि कंप्यूटर कभी इंसानों जैसे नहीं हो सकते क्यूंकि वो हमेशा एक नियत नियम और स्वयंसिद्ध कथनों पर आधारित होते हैं। जबकि हमारा दिमाग नहीं... इसलिए हम अनजाने, अप्रत्याशित सत्यों से रूबरू होते रहते हैं। दार्शनिक वैसे इस प्रमेय को इंसानी दिमाग पर भी लगाते हैं और कहते हैं कि हर एक तार्किक प्रणाली की तरह ही एक इंसान भी अपने आपको कभी पुर्णतः नहीं समझ सकता क्योंकि हम खुद के बारे में खुद की ही प्रणाली से ही तो जानते हैं। और हर प्रणाली ही अपने खुद की असंगति को सिद्ध नहीं कर सकती ! [हरी ॐ तत्सत् ! Smile क्या क्या तो मस्त सोच गए हैं लोग !]

यहाँ ध्यान देने की बात है कि गोडेल ने ये नहीं कहना चाहा कि जो है वो गलत या बेकार है। गोडेल ने कहा कोई भी प्रणाली पूर्ण नहीं है। मेकेनिकल तरीके से नियम कितने भी तार्किक हो कुछ कमी तो रहनी ही है। और हमें गणित में (और अन्यत्र भी) अंतर्ज्ञान और निरंतर खोज को जारी रखना चाहिए। नियमों और तर्क पर आधारित प्रणाली एक मशीन ब ना सकती है... कम्प्युटर, सैटेलाइट, रॉकेट इत्यादि। विशालकाय सिस्टम जिसमें सब कुछ तार्किक हो... पर इंसान का इंट्यूशन, उसका अंतर्ज्ञान हमेशा होना चाहिए... क्योंकि सिस्टम में एक अपूर्णता रहनी ही है। [और हम कहते हैं कि किसी ने कह दिया या किसी ने लिख दिया तो वो सत्य है ! फ्लैक्सिब्ल होने के लिए 'वादियों' को गणित पढ़ना चाहिए :)]

अगर आपने कभी कंप्यूटर प्रोग्राम लिखा है तो आपको पता होगा इनफिनिट लूप क्या होता है। इसे हाल्टिंग प्रॉब्लम भी कहते हैं। गलती से ऐसा हो जाता है कि प्रोग्राम चलता ही रह जाता है हमेशा के लिए। सवाल ये है कि क्या ऐसा कोई तरीका हो सकता है जिससे पता लगाया जासके कि कोई प्रोग्राम ऐसे लूप में फँसेगा या नहीं? उत्तर – “नहीं” !  - अपूर्णता प्रमेय !

उसी तरीके से कोई ऐसा प्रोग्राम नहीं हो सकता जो कंप्यूटर के ऑपरेटिंग सिस्टम को छेड़े बिन वायरस का पता लगा सके। अर्थात प्रणाली के बाहर का लाना ही पड़ेगा - अपूर्णता !

यानी हमेशा ऐसे सच होंगे जो सिद्ध नहीं किये जा सकते या कुछ असत्य सत्य सिद्ध हो जायेंगे। और दूसरा प्रमेय ये कहता है कि अगर कोई प्रणाली अपने सिद्धांतो से स्वयं को संगत सिद्ध करती है तो वो प्रणाली ही असंगत है !

हमने फेसबूक पर लिखा था -

There will *always* be more true things than what we can know and prove...
... and there will *always* be things that, despite being true, cannot be proven to be true. (-incompleteness theorem)

…so its not strange if We know something is truth but we can't prove it and vice versa!

हरी ॐ तत्सत् ! Smile

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~Abhishek Ojha~

Friday, March 8, 2013

... do what you must, come what may. (भाग 2)

(पिछले भाग से जारी)

सोनिया, व्लादिमीर और अनिउता पहले विएना गए पर एक तो विएना महंगा बहुत था और दूसरे सोनिया को वहाँ के विश्वविद्यालयों के गणित का स्तर भी पसंद नहीं आया। अनिउता वहाँ से फ़्रांस चली गयी जहां उसने बाद में राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सेदारी निभाई। सोनिया और व्लादिमीर कुछ दिनों बाद इंग्लैंड चले गए। व्लादिमीर जीवाश्मिकी का छात्र था वहाँ उसे चार्ल्स डार्विन और थॉमस हक्सले के साथ काम करने का मौका मिला। सोनिया यहाँ लेखिका जॉर्ज ईलियट के संपर्क में आई। पर उसका सपना पूरा हुआ जब वो जर्मनी गयी जहां उसे हिडेलबर्ग विश्वविद्यालय में गणित और भौतिकी के व्याख्यानों में बैठने की अनुमति मिल गयी। यहाँ सोनिया की ख़्वाहिश थी रॉबर्ट बुंसेन (बुंसेन बर्नर वाले) के मार्गदर्शन में पढ़ने की। रोबर्ट बुंसेन औरतों की पढ़ाई के सख्त खिलाफ थे। उन्होने कह रखा था की कोई भी महिला उनकी प्रयोगशाला में काम नहीं कर सकती। पर सोनिया कोवलेव्सकी पहली महिला थी जिसे उन्होने अपने प्रयोगशाला में काम करने की अनुमति दी।

सोनिया इसके बाद विख्यात गणितज्ञ कार्ल विस्ट्रास के मार्गदर्शन की आस में बर्लिन गयी। विस्ट्रास के लिए भी किसी महिला का गणितज्ञ होना असहज था। सोनिया को टालने के लिए उन्होने कुछ कठिनतम प्रश्न हल दे दिया इस शर्त के साथ कि अगर सोनिया ने उन प्रश्नो को हल किया तो वो उसे मार्गदर्शन देने को सहमत हों जाएँगे। कुछ दिनों बाद सोनिया ने जिस प्रभावी तरीके से  उन प्रश्नों पर किया गया अपना काम विस्ट्रास को दिखाया तो विस्ट्रास ने निजी मार्ग दर्शन देना स्वीकार कर लिया। ये सोनिया के गणितीय अध्ययन के सबसे अच्छे दिन रहे। 1874 में 24 वर्ष की अवस्था में सोनिया ने  पर्शियल डिफ़ेरेन्शियल समीकरण, शनि के वलय और एलिप्टिक इंटीग्रल पर तीन शोधपत्र गोटिंगेन विश्वविद्यालय में डोक्ट्रेट की उपाधि के लिए प्रस्तुत किया। विस्ट्रास के सहयोग और पत्रों की गुणवत्ता को देखते हुए बिन कक्षाओं में गए और बिना किसी परीक्षा के गोटिंगेन विश्वविद्यालय ने सोनिया को डोक्ट्रेट की उपाधि प्रदान की।  ये उपाधि प्राप्त करने वाली वो यूरोप की पहली महिला थी।

इनमें से पर्शियल डिफ़ेरेन्शियल समीकरण पर किये गये उनके काम का एक हिस्सा अब कौशी-कोवलेव्सकी थियोरम के नाम से जाना जाता है।

महिला होने कि वजह से विस्ट्रास की मदद के बावजूद सोनिया को कहीं अध्यापन का काम नहीं मिल पाया। गरीबी और फिर शेयर धांधली के आरोप के भय से व्लादिमीर की आत्म हत्या जैसे बुरे दिनों का अंत 1884 में हुआ जब सोनिया को स्वीडन के स्टॉकहोम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी मिली। यहाँ सोनिया को बहुत से पुरस्कार और सम्मान भी मिले। 1888 में सोनिया ने "द प्रॉबलम ऑफ द रोटेशन ऑफ अ सॉलिड बॉडी अबाउट अ फ़िक्स्ड पॉइंट" के नाम से एक शोधपत्र पेरिस अकादमी ऑफ साइंस में पृक्स बोरडीन पुरस्कार के लिए जमा किया। ये पुरस्कार गणित में मौलिक काम के लिए दिया जाना वाला सबसे बड़ा पुरस्कार माना जाता था। इस पत्र में वर्णित एक सिद्धान्त को अब कोवलेव्सकी टॉप के नाम से जाना जाता है।

पुरस्कार में कोई भेदभाव न हो इसलिए अकादमी ने पूरी तरह से बेनामी पत्र मंगाए थे। हर पत्र पर एक पहचान के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखनी थी। और साथ ही एक अलग सील किए गए लिफाफे में अपना नाम और वही पंक्ति लिखनी थी। उस साल ये पुरस्कार सोनिया कोवलेव्सकी को मिला... उन्होने अपने पत्र पर ये पंक्तियाँ लिखी थी -

"Say what you know,
Do what you must,
Come what may."

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~Abhishek Ojha~

(Mathematicians are people, too और थोड़ी इधर उधर से पढ़ी गयी जानकारी पर आधारित)