गणित और भय में चोली-दामन का रिश्ता है और हाल ही में मुझे रंजनाजी के सौजन्य से पता चला की ये यूरोपीय विचारधारा की देन है. रंजनाजी ने कुछ दस दिनों पहले मुझे ये अखबार का टुकडा स्कैन कर के भेजा. अब उन्हें लगा की मुझे इस पर कुछ लिखना चाहिए... अब मेरे दिमाग में तो यही आया 'अब आगे से किसी को गणित से डरने के जरुरत नहीं... ये गणित से डरना फिरंगियों की सोच से प्रभावित है.' लेकिन इससे कोई फायदा है क्या, किसी की भी विचारधारा हो ? जैसे बच्चे को कितना भी समझा लो कि बेटा भूत-वूत कुछ नहीं होता, सब वहम है... पर वो तो डरेगा ही ! वैसे ही क्या फर्क पड़ता है कि किसने डराने वाला गणित बनाया... अब ये वहम मिटाना आसन नहीं.
खैर बात इस ख़बर की... मुझे पढने के बाद यही लगा कि ये प्रो राजू की पुस्तक 'कल्चरल फाउण्डेशनस ऑफ़ मैथेमेटिक्स' में कही गई बात है. इसका स्रोत ढूंढने की थोडी कोशिश भी की... गणित भले ही यूरोपीय सोच की देन हो ना हो... ये ख़बर इन बातों पर आधारित है: प्रो राजू की पुस्तक में यह कहा गया है की कलन (Calculus) जिसके लिए कहा जाता है कि न्यूटन (Newton) और लिबनिज (leibnitz) दोनों ने स्वतंत्र रूप से विकसित किया, दरअसल भारत की देन है. कलन के कई प्रमुख सिद्धांत आर्यभट, भास्कर, नीलकंठ, शंकर वारियार जैसे गणितज्ञों के कई खगोलीय और गणितीय कामों में पाये जाते हैं जिसे मैटियो रिक्की नामक जेसुइट द्वारा कोचीन से यूरोप ले जाया गया. अन्यत्र प्रो राजू कहते हैं की प्राचीन भारतीय और यूरोपीय गणितीय सोच में बहुत अन्तर है. भारतीय गणित जहाँ व्यवहारिक था वहीँ यूरोप ने इसे धर्म से जोड़ दिया. भारतीय 'प्रमाण' में जहाँ 'लगभग' की मान्यता थी वहीँ यूरोप के 'प्रूफ़' में इसे परफेक्ट बना दिया गया. प्लेटो ने जोड़-घटाव (व्यवहारिक गणित/Applied Mathematics) वाले गणित को प्रूफ़ (प्रूफ़ पर आधारित शुद्ध गणित/Proof based Pure Mathematics) वाले गणित से नीचे माना और यह मान्यता आज तक शिक्षाविदों में चली आ रही है कि शुद्ध गणित व्यवहारिक गणित से ज्यादा श्रेष्ठ है. जबकि भारत में कभी भी ऐसा विवाद नहीं रहा... प्राचीन भारतीय गणित केवल पढने के लिए कभी नहीं था बल्कि हमेशा ही वो किसी व्यवहारिक उपयोग को लेकर रहा है. जबकि शुद्ध गणित जो यूरोपीय सोच का नतीजा था वो केवल पढने के लिए रहा… अर्थात वास्तविकता से दूर.
गणित के इस रूप के भारत से यूरोप जाने और विकृत होने के बारे में प्रो राजू कहते हैं की यूरोप में नौसंचालन के लिए की जाने वाली शुरूआती गणनाओं में कई गलतियाँ थी. जिससे समस्याएं भी होती थी और नौसंचालन में सुविधा के लिए किए जाने वाले आविष्कारों के लिए कई यूरोपीय राज्यों ने आकर्षक पुरस्कारों की घोषणा कर रखी थी. इनके सुधार के लिए भारतीय गणित और पंचांगों को जेसुइट केरल से यूरोप ले गए. केरल उस समय शिक्षा और गणित का केन्द्र हुआ करता था क्योंकि विजयनगर राज्य की प्रभुता के कारण यह उत्तरी हमलों से एकदम सुरक्षित था. जेसुइट समुदाय के लोगों का स्थानीय लोगों से घुल-मिल कर रहना था और उन्हें भाषा की दिक्कत भी नहीं होती थी. इस तरह कई त्रिकोणमितीय अनुपातों को निकालने की विधि सहित पंचांगों और अन्य खगोलीय तथा गणितीय अध्ययनों में उपयुक्त सिद्धांत यूरोप पहुच गए. वहाँ आध्यात्म विद्या (Theology) से जुड़ जाने के कारण इसमें अमूर्तता (Abstraction) आई और फिर इसका रूप कठिन होता गया और भय का रूप लेता चला गया....
अगर व्यवहारिक गणित और शुद्ध गणित क्या है ये जानने की इच्छा हो तो ये देख लें:
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ये प्रो राजू के विचार हैं और इनमें से कई विचारों पर मेरी व्यक्तिगत सहमती नहीं है. उनके कुछ लेख और विचार पढने के बाद उनसे भारी असहमति लगती है. उस पर उनकी किताब पढने के बाद कभी चर्चा होगी.
फिलहाल ये गणित से डरना अपना काम नहीं ये यूरोपीय विचार धारा है. गाँधी बाबा को ये बात पता होती तो स्वदेशी आन्दोलन का हिस्सा बन गया होता "हम गणित से नहीं डरेंगे क्योंकि ये यूरोपीय विचारधारा है" और चरखे के साथ-साथ वैदिक गणित और लीलावती जैसी पुस्तकें भी होती ! खैर अभी भी स्वदेशी आन्दोलन चलाने वाले लोग हैं उन तक बात पहुचाने की जरुरत है. :-)
रंजनाजी को धन्यवाद !
~Abhishek Ojha~