Friday, July 31, 2015

...समीकरणरूपाय जगन्नाथाय ते नमः !


पिछले दिनों एक यज्ञवेदी पर बनी रेखाओं को देख मैंने कहा - "वेदी पर बने ये खूबसूरत पैटर्न ज्यामिति की माँ है. क्योंकि ज्यामिति की शुरुआत यहीं से हुई थी.  यज्ञ-वेदी रचना की ज्यामिति को 'शुल्बसूत्र' के नाम से जाना जाता है. इन प्राचीन सूत्र-श्लोकों में गणित के कई प्रतिष्ठित प्रमेय भी मिलते हैं।"

शुल्ब यानी डोरी। शुल्बसूत्र यानी रस्सी-सूत्र. आज भी यज्ञ वेदियों पर 'पैटर्न' धागे से ही बनाये जाते हैं.

जिससे कहा उसने पूछ लिया "पर यूक्लिड एवेन्यू स्टेशन के पास तो तुमने कहा था कि - 'यूक्लिड को फादर ऑफ़ ज्योमेट्री कहते हैं?" खैर… ज्यामिति के जन्म की बात फिर कभी.

फिलहाल आप रेखाओं से बना ये 'ग्राफ' देखिये जो मैंने बनाया 47 समीकरणों और पता नहीं कितने समय में ! मैंने 'ग्राफ' कहा क्योंकि ये कलाकृति नहीं सिर्फ एक गणितीय रेखा चित्र है [वैसे अगर आपकी नजरें इसे कला के रूप में देख रही हैं तो बेशक आप इसे कलाकृति कह सकते हैं] जो 47 समीकरणों से मिलकर बना है.

"नीलाचलनिवासाय नित्याय परमात्मने. बलभद्रसुभद्राभ्यां समीकरणरूपाय जगन्नाथाय ते नमः". 

अगर यकीन न हो रहा हो तो आगे पढ़े. और यकीन हो गया हो तब तो आप वैसे भी पढ़ेंगे ही :)

अब बात क्यों और कैसे की.

पहले बात "कैसे" की 

नीचे वाली तस्वीर देखिये जो इस चित्र के बनाने के विभिन्न चरण हैं. आप ग्राफ की कुछ आकृतियों को आसानी से पहचान लेंगे -  वृत्त और रेखाएं तो सहज ही  ! इसके अलावा एलिप्स (अंडाकार), रेखा, परैबला के अलावा कुछ थोड़े और जटिल समीकरण। नीचे के ग्राफ में आप अलग-अलग रंगों को देखेंगे तो पता चलेगा कौन सा हिस्सा कैसे बना है. जैसे सबसे बड़ा वृत्त: x^2 + y^2 = 100.  यानी १० त्रिज्या (रेडियस) का एक वृत्त जिसका केंद्र शुन्य है. 


अब बात कुछ और हिस्सों की. y = ।x। का ग्राफ  होता है V की तरह. y = ।2x।, y = ।3x। इत्यादि का ग्राफ  भी ऐसा ही होता है… आप नीचे नीली और लाल रेखाओं से घिरे क्षेत्र को देखिये और अगर x या y को एक सीमा के भीतर ही रख दिया जाय तो… आप ढूंढिए कि चित्र का कौन सा हिस्सा इन दो समीकरणों से बना है: y+3= |4x|,  y+2=|x|, {y <-1.6}



सीमा तय करने से याद आया चित्र का वो हिस्सा जो सिर्फ एक समीकरण से बन गया. उस हिस्से के लिए बहुत सारे समीकरण  सोचने के बाद एक दिन ध्यान आया कि कार्टेसियन की जगह अगर पोलर का इस्तेमाल किया जाय तो मामला आसानी से हल हो  सकता है. फिर थोड़े सोच-प्रयोग के बाद जो समीकरण हाथ लगा वो शायद इस चित्र का सबसे खूबसूरत समीकरण है ! r=cos(124theta)^3+10, .65 < theta <2.5 9.6 < r < 10 यानी नीचे के ग्राफ को r और theta पर सीमा लगा कर काट छांट कर देने से वो खबसूरत हिस्सा बन गया. समीकरण एक और... ग्राफ देखिये !  खूबसूरती कहाँ लिखी जा पाएगी... आप पढ़ते हुए शायद भावना समझ जाएँ ! काट छांट से मतलब है कि पेंटिंग बनाने में एक ब्रश ज्यादा चल गया तो पेंटिंग गयी ! पर यहाँ उल्टा है. बड़े ग्राफ को सीमित कर काट-छाँट कर ग्राफ बना. जैसे मकान बनाने का एक तरीका होता है एक-एक ईंट जोड़कर बनाने का पर वहीँ एलोरा के कैलासनाथ मंदिर के बनाने का भी एक तरीका था पहाड़ को काट उसमें मंदिर गढ़ना :)


इसी तरह आँखों के ऊपर का हिस्सा। हाइपरबोला और कुछ पॉलिनोमिअलस सोचने के बाद अंत में लॉग और एक्सपोनेंशियल पर आकर बात रुकी  - इन समीकरणों से चित्र का कौन सा हिस्सा बना ये तो आप देख ही सकते हैं. 


हाँ दो और पोलर समीकरण भी तो है - 
जाते जाते सरल समीकरण - तिलक-अंश:



बाकी हिस्से तो आप समझ ही गए होंगे। सरल और सुन्दर!  






अब बात 'क्यों' की -

'क्यों' का जवाब इतना भारी भी नहीं है. आप तो जानते ही हैं कि "माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। और वैसा ही कुछ आनंद गणित देख…" आगे आप जो सोच रहे हैं। …वैसा कुछ नहीं है :).

तो बिन बकवास असली बात -

अगर आप भी 'उस जमाने' के ब्लॉगर हैं तो आपको याद होगा वो जमाना जब गूगल रीडर और बज्ज हुआ करते थे. तब हमने एक पोस्ट शेयर किया था (शायद २०११ में). किसी ने बैटमैन को ऐसे ही बनाया था (शायद ये). तब अपने आलसीजी ने कहा था - "ऐसे ही भगवान जगन्नाथ को बनाइये."  हमने कहा - "बिलकुल कोशिश करेंगे".  उस समय बात उतनी ही गंभीरता से ली गयी थी जितनी एक शेयर किये गए लिंक के कमेंट पर कही गयी बात ली जाती है. पर 'समहाउ' ये बात कभी दिमाग से निकली नहीं. किसी कोने में कुलबुलाती रही. कभी कभी सोचता कि कौन सा हिस्सा  कैसे बन सकता है. जब कभी कोई फ्रैक्टल या खूबसूरत ग्राफ  दिखा या जब कभी रथ यात्रा-पूरी-जगन्नाथ भगवान की बात सुनाई या दिखाई दी. जब-जब मोमा गया…  और ऐसे ही कई पल हुए जब राख में दबी इस बात की चिंगारी सुलगती रही. फिर एक दिन प्रिंटआउट लिया और डेस्क पर बैठे-कॉल्स-मीटिंग-ऑफिस आते जाते-खींचम-खाँची-कट्टम-कुट्टी से जो एब्सट्रैक्ट आर्ट मेरे  नोटबुक में बन जाता है जो सिर्फ मैं ही समझ  पाता हूँ. [कभी उन्हें खोदना है… बहुत सी बातें-भावनायें जो पन्नों पर उतर न सकी उन नोटबुक्स के पन्नों की  दबी पड़ी है. खैर...] उन्ही के बीच से भगवान जगन्नाथ के इस ग्राफ का अभ्युदय हुआ ! ....जब कार्य पूरा हुआ तो लगा मेहनत बेकार नहीं गयी. ऐसे और प्रयास किये जा सकते हैं. और अगर अच्छे से फ्रेम करा कर घर में लगाया जाय तो मॉडर्न आर्ट से तो बेहतर है ही.* इस कला में  आगे भी और हाथ आजमाने का मन है. वैसे कला के नाम पर साड़ी का किनारी, आम-अमरुद पत्ती के साथ, कमल का फूल पानी के साथ ('आई थिंक बस') इससे ज्यादा  कभी कुछ बना नहीं पाए...**

… रेखाओं का खेल है मुकद्दर रेखागणित !

वेदांग ज्योतिष में कहा गया है -
यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा।
तथा वेदाङ्गशास्त्राणां गणितं मूर्ध्नि स्थितम्॥

~Abhishek Ojha~

[* ये शुभ काम तो मैं जल्दी ही करने वाला हूँ :) ]
[*वैसे कला में रूचि की इस सीमा के बाहर एक 'एक्सेप्शन' का दौर भी गुजरा है ! ]

31 comments:

  1. वाह। बहुत खूब। बेहतरीन । बहुत दिन बाद गणितीय पोस्ट पढ़ी। जय हो।

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  2. गजब महाराज गजब :)

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  3. हमें तो इस गणितीय रचना को देखकर अगणित आनंद आया। क्यों कि गणित से हमने बहुत पहले दूरी बना ली थी और दर्शन का साथ पकड़ लिया था।

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  4. वाह! शानदार. हमें गणितीय आर्ट और चाहिए!!

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  5. यह गणितीय फ्रेमवर्क के रूप में कब मिलेगा??

    बाकी तो गणित भूल भुलाय गया
    लेकिन ब्लॉगर की आत्मा ज़िंदा है यह देख सुखद आश्चर्य हुआ।

    जय हो ओझा जी की। :)

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  6. Tum bemisal ho dost :) Is post ko viral hona chahiye..
    Muqaddar likhkar jo thoda sa khela hai, wo bhi gazab hai ;)

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  7. वाह। यानी जो देवताओं के स्वरुप हैं उन रूपकों से गणित की कई पहेलियाँ निकल सकती हैं।

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  8. गणित के बिना कोई कला संभव नहीं। कलाकार फिजूल ही उससे डरते हैं। बेहतरीन प्रयास।

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  9. रोचक लेख और सराहनीय प्रयास. गणित कला है और कला गणित है. धन्यवाद !

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  10. प्रिंट लेकर दीवार पर टांगने का जुगाड़ करते हैं, अभी पेटेंट तो नहीं करवाया न? एक दो दिन बात करवाईयेगा :)

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  11. HAPPY INDEPENDENCE DAY
    सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार...

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  12. आपकी की पोस्ट ओर ब्लाँगों से अलग हैं ...
    अच्छी पोस्ट
    http://savanxxx.blogspot.in

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  13. Start self publishing with leading digital publishing company and start selling more copies
    start selling more copies, send manuscript

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  14. झिंझौड़ डाला। इस रेखागणितीय दृष्टि से देखा जाय तो बहुत-कुछ नया उद्घाटित होने की सम्भावना है।

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  15. झिंझौड़ डाला। इस रेखागणितीय दृष्टि से देखा जाय तो बहुत-कुछ नया उद्घाटित होने की सम्भावना है।

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  16. रमानाथाय नाथाय, जगन्नाथाय नमो नमः।
    एतना ही कह सकते हैं।

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  17. वाह गणित से कला...क्या बात!

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  18. वाह गणित से कला...क्या बात!

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  19. दैवीय रूपक भाव से जुड़े हैं यह तो स्पष्ट था लेकिन इनमें गणितीय समीकरण भी छिपे हैं यह जानना रोचक है. अभी तक केवल यंत्रों को ही गणित से जुड़ा समझा था...

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  20. दैवीय रूपक भाव से जुड़े हैं यह तो स्पष्ट था लेकिन इनमें गणितीय समीकरण भी छिपे हैं यह जानना रोचक है. अभी तक केवल यंत्रों को ही गणित से जुड़ा समझा था...

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  21. आपका शोध परक तथ्य पढ़ने को प्रेरित करता है ।
    आपके परिश्रम का वन्दन है ।

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  22. आपका शोध परक तथ्य पढ़ने को प्रेरित करता है ।
    आपके परिश्रम का वन्दन है ।

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  23. पहले तो गणित के नाम से ही भागने की सोची फिर भगवन जगन्नाथ के नाम पर पोस्ट पढ़ना चालू किया तो रोचकता बढ़ती गयी । गणित इतनी रोचक तो कभी नही थी ।

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  24. पहले तो गणित के नाम से ही भागने की सोची फिर भगवन जगन्नाथ के नाम पर पोस्ट पढ़ना चालू किया तो रोचकता बढ़ती गयी । गणित इतनी रोचक तो कभी नही थी ।

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  25. गणित और सनातन ज्ञान को जोड़ने वाली इतनी रोचक प्रस्तुति शायद ही पहले कभी पढ़ी हो

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  26. अद्भुत। बहुत सुंदर।

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  27. हमें तो इस गणितीय रचना को देखकर अगणित आनंद आया। क्यों कि गणित से हमने बहुत पहले दूरी बना ली थी , गणित इतनी रोचक तो कभी नही थी !!!!अदभुत लिखा है मन आह्लादित हो गया

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